02 मार्च, 2009

जड़मेंथा मतलब

पिंटू और सिंटू दो भाई थे दोनों बहुत शरारती थे। दिन रात खेलते रहते थे कभी स्कुल नहीं जाते और घर पर जो भी मास्टर पढाने आता उसे भगा देते थे । माँ-बाप बड़े परेशान थे की कैसे पढेगे । उन्होंने एक नया मास्टर घर पर पढाने के लिए रखा , मास्टर ने कहा की वह अपने तरीके से बच्चों को पढायेगा।

मास्टर पिंटू और सिंटू के पास जाता है और बोलता है की " वह उन्हें पढायेगा नहीं बल्कि उन्हें नए-नए खेल सिखायेगा "। पिंटू और सिंटू खुश हो जाते है । एक सप्ताह हो जाते मास्टर उन्हें कई नए खेल सिखाता है , एक दिन वह उन्हें पतंग उड़ना सिखाता है । पिंटू पतंग उड़ा रहा होता है तो मास्टर सिंटू से पूछता है "बताओ तुम्हारी पतंग का रंग क्या है? "। सिंटू बोलता है "पीला "। वो फिर पूछता है "और जो सामने पतंग उड़ रही है उसका रंग क्या? "। सिंटू बोलता है "लाल "। मास्टर फिर पूछता है "क्या तुम बता सकते हो इस समय आसमान में कितनी पतंग उड़ रही है ?"। तभी पिंटू पतंग छोड़ते हुए चिल्लाता है "भाग सिंटू भाग ! ये तो पढ़ा रहा है "।

कुछ दिनों बाद पिता के बहुत डांटने-मारने पर वो स्कुल जाते है । कक्षा में जब हिंदी के मास्टर आते है तो पिंटू मास्टर से पूछता है की "जड़मेंथा मतलब क्या होता है ?" , सिंटू भी हाँ में हाँ मिलता हुआ पूछता है की उसे भी जड़मेंथा का मतलब पूछना था । मास्टर बहुत सोचने के बाद बोलते है की वो उसका अर्थ कल बतायेंगे । मास्टर साहब जड़मेंथा शब्द "हिंदी शब्द कोष और हिंदी शब्द सागर" में खोजते है पर नहीं मिलता तो वो हिंदी के एक विद्वान से पूछते है की "जड़मेंथा का अर्थ क्या होता है " । हिंदी के विद्वान पूछते है की "ये शब्द आप ने कहाँ पढ़ा ?"। तो मास्टर साहब बताते है की आज कक्षा में दो बच्चों ने पूछा । विद्वान बोलते है तो आप उनसे पूछिये की उन्होंने ये शब्द कहाँ पढ़ा । अगले दिन मास्टर साहब सिंटू और पिंटू से पूछते है "जड़मेंथा शब्द तुमने कहाँ पढ़ा ?"। पिंटू बोलता है "मास्टर जी कहानी वाली किताब में लिखा है "। घर जाके मास्टर साहब किताब को कई बार पढ़ते है पर उन्हें जड़मेंथा शब्द कही नहीं मिलता । अगले दिन वो फिर पूछते है "किताब में कहाँ पर लिखा हुआ है ?"। पिंटू बोलता है "मास्टर जी वो दूसरी कहानी में लिखा है 'सांप पेड़ की जड़ में था'"।

28 फ़रवरी, 2009

नक़ल के लिए अक्ल चाहिए

अक्सर हम देखते हैं की कुछ लोग दूसरो की नक़ल कर के उनके जैसा बनना चाहते है पर वो वैसा कर नहीं पाते उसका कारण ये है की नक़ल के लिए भी अक्ल चाहिए । चलिए मैं आप को एक कहानी सुनाता हूँ । कहानी बहुत पुरानी है शायद आपने सुना भी होगा।

एक ठाकुर साहब अपने छोटे भाई को ले के अपनी ससुराल जाते हैं। ससुराल में ठाकुर साहब की बड़ी खातिरदारी होती है। रात को जब खाने का समय होता है तो वो बोलते है की "हम भोजन नहीं करेगे बस थोडा दही मिल जाये तो खा के सो जायेगे" । दामाद की बात का पालन होता है उनके लिए दही आ जाती है । खाने के बाद बोलते है हम घर में नहीं सोयेगे बाहर एक चारपाई लगवा दी जाये और और एक चद्दर ओढ़ने के लिए दे दी जाये । सुबह उठके ठाकुर साहब कुएं पर जाते है और स्नान करते है । नाश्ता करके वो वापस अपने घर आ जाते है । छोटा भाई जो उनके साथ गया होता ये सारी बाते याद कर लेता है ।

कुछ महीने बाद वो भाई अपने ससुराल जाता है । रात को खाने में वो दही मागता है तो उसकी सास बोलती है "दामाद जी हमने आप के लिए बहुत सारे व्यंजन बनाये है आप दही क्यों खाना चाहते है"। वो कहता है की "मुझे केवल दही ही चाहिए "। दही खाने के बाद वो ठाकुर साहब वाली बात कहता है की "हम घर में नहीं सोयेगे बाहर एक चारपाई लगवा दी जाये और और एक चद्दर ओढ़ने के लिए दे दी जाये" । सब मना करते है लेकिन वो नहीं मानता । फिर वो सुबह उठ के कुएं के ठंडे पानी से नहा लेता है और बहुत ज्यादा बीमार पड़ जाता है ।

ठाकुर साहब को जब ये बात पता चलती है तो उसके पास जाते है और कहते हैं की "तुमने सब कुछ याद रक्खा और उसकी नक़ल की पर ये भूल गए की जब मैं अपनी ससुराल गया था तो गर्मी के दिन थे और इस समय सर्दी का समय है "। बहुत इलाज के बाद उसकी की जान बचती है ।

तो आप जब भी किसी की नक़ल करे तो अपनी बुद्धि का प्रयोग अवश्य करे अन्यथा आप मुसीबत में पड़ सकते हैं ।

27 फ़रवरी, 2009

सुनो सब की करो अपने मन की

अब ऐसा नहीं की मन जो कहे आप वही करने लगे , मन बड़ा चंचल होता है उसकी सुने लेकिन निर्णय दिमाग को करने दे ।आप ने महसूस किया होगा जो काम आप मन लगा के करते है उस काम को करने में आप थकान,आलस्य नहीं महसूस करते बल्कि आप बड़े उत्साह और तेजी के साथ उस काम को करना चाहते हैं पर जब कोई काम बिना मन के किया जाता है तो थोडा ही करने के बाद आप आलस्य और थकान महसूस करने लगते हैं और उस काम को और करने की इक्क्षा ख़त्म होने लगती है, हाँ अगर कार्य करते हुए अगर कुछ रोचक हो जाता है तो बात अलग होती है ।

हाँ तो मैं बात कर रहा था "सुनो सब की करो मन की" तो अब आप को एक कहानी सुनाता हूँ शायद ये कहानी आप ने पहले भी सुनी या पढ़ी होगी .

एक बार एक बाप - बेटा खच्चर पे सामान ले के कही दूर जा रहे थे , थोडी दूर जाने पर बाप ने बेटे से कहा की तुम खच्चर पे बैठ जाओ मैं पैदल चलता हूँ । बेटा खच्चर पे बैठ जाता है तभी उधर से कुछ लोग गुजरते है और कहते हैं " कैसा नालायक बेटा है खुद खच्चर पे बैठा है और बाप पैदल चल रहा है "। बेटा उनकी बात सुनता है और खच्चर से उतरकर अपने पिता को बैठा देता है । थोडी दूर जाने पर कुछ और लोग मिलते है और बोलते है "कैसा पिता है खुद आराम से खच्चर पे बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है "। बाप जब ये सुनता है तो वो अपने बेटे को भी खच्चर पे बैठा लेता है . थोडा और आगे जाने पर कुछ लोग मिलते है और कहते है "अरे तुम कैसे इन्सान हो दोनों इस खच्चर पे बैठे हो ,बेचारे खच्चर की जन लोगे क्या ".ऐसा सुन कर दोनों बाप बेटे उतर कर पैदल चलने लगते है . रस्ते में फिर उन्हें एक आदमी मिलता है और बोलता है "कैसे पागल है, खच्चर होते हुए भी पैदल चल रहे हैं ". अब बाप-बेटे का दिमाग ठनक जाता है की कैसे लोग है दुनिया में हर चीज पर अलग - अलग राय देते हैं , किसी भी तरह जीने नही देते . फिर बाप बोलता है बेटा इस संसार में सुनना सबकी पर करना वही जो तुम्हारा दिल और दिमाग कहे .

हमें अक्सर अपने आस-पास कुछ लोग मिल जाते है जो मुफ्त में सलाह देते है पर उनकी सलाह कितनी सही है ये तो हमें ही जाचना होगा . तो इसलिए सुनिए सब की पर करिए अपने मन की . जब आप कोई काम अपने मन से करेगें तो उसकी सफलता और असफलता पर केवल आप का अधिकार होगा .

"उठो , जागो जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो तब तक रुको नहीं " विवेकानंद


26 फ़रवरी, 2009

विश्व के कुछ देशो के पुलिस के वाहन

पुलिस वाहन स्विट्जरलैंड
जर्मनी
आस्ट्रिया
चाइना
पाकिस्तान
भारत
और आप कहते है की पुलिस काम नही करती, काम तो हो रहा है सिपाही दरोगा साहब को कंधे पे लेके घर जा रहा हैं .अब क्या जान लेगे ?

जिन्दगी की इस दौड़ में

जिन्दगी की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है ?
जब यही जीना है दोस्तों तो फिर मरना क्या है ?

पहली बारिश में छाते की फ़िक्र है
भूल गए वो भीगते हुए टहलना?

धारावाहिक के किरदारों का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछने की फुर्सत नहीं है ?

अब घास पे नंगे पाव टहलते क्यों नहीं ?
१५० चॅनल फिर भी दिल बहलते क्यों नहीं ?

इन्टरनेट से दुनिया के तो सम्पर्क में है ,
लेकिन पड़ोस में कौन रहता है ख़बर तक नहीं .

मोबाइल , लैंड लाइन सब की भरमार है ,
लेकिन जिगरी दोस्त तक पहुचे ऐसे तार कहा है ?

कब डूबते हुए सूरज को देखा था ?
कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है ?

सुबह उठ के कब सुना था चिडियों का चहकना ,
अलार्म के बजाने पर सुबह का पता चलता है ।

कब खाया था आराम से बैठ के भूल गए .
वो माँ के हाथो से खाना याद है ?

वो दोस्तों के साथ दिन गुजारते थे .
आज खुद के लिए वक़्त नहीं है .

तो दोस्तों जिन्दगी की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है
जब यही जीना है तो फिर मरना क्या है ?

25 फ़रवरी, 2009

आइये थोड़ा मुस्करा ले

मै शेर सुनाता हूँ गौर से सुनिए , मै शेर सुनाता हूँ गौर से सुनिए , मुझे नहीं आता किसी और से सुनिए ....

कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को नुक्लियर पावर का ज़माना है , बम्ब से उड़ा दो साले को ...

फ़ोन करता हूँ तो इतराती बोहत हो क्या करुँ दिल को लुभाती बोहत हो सोचता हूँ तुम्हे डिनर पर बुलाऊं पर क्या करू ? तुम खाती बोहत हो .

सूरज हुआ मद्धम चाँद भी चलने लगा , मैं ठहरा रहा ज़मीं चलने लगी सजना क्या यही प्यार है ??? पागल ,यह प्यार नहीं , भूकंप है !! भाग

टीचर संता से पूछता है " तुम कहा पैदा हुए ?" संता : तिरुवनंतपुरम में . टीचर : लिख के दिखाओ ? संता : (सोचने के बाद ) मैं सोच रहा हूँ की मैं कटक में पैदा हुआ था .

७ साधु , ७ चटाई पर ध्यान लगाकर बैठे थे . एक लड़का आता है और सबसे बुजुर्ग साधु को प्रणाम कर पूछता है... "महाराज लड़की नहीं पट रही है , क्या करू ...?" वो साधु सबसे छोटे साधु को पुकारता है और कहता है "छोटू एक और चटाई लगा दे बेटा ...."