कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

18 अप्रैल, 2009

बाप बाप है

बेटा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये बाप से दो कदम पीछे ही रहता है । किसी ने मुझसे कहा की यदि ऐसा है तो जीतनी खोज आज तक हुई है वो खोजे उनके बाप ने क्यों नहीं की , नई दुनिया की खोज तो कोलम्बस के बाप को कर लेनी चाहिए थी, कोलम्बस ने क्यों की ? मैंने कहा "मैं उस बारे में नहीं कह रहा हूँ , मेरा अर्थ कुछ दूसरा है "। मैं आपको एक घटना सुनाता हूँ ।

एक लड़का अजय घर से दूर रह कर इंजीनियरिंग की पढाई करता था । उसने अपने सभी दोस्तों से बता दिया था की उसके पिता जी बहुत खतरनाक है , बहुत मारते है , अगर वो कभी आयें तो तुम लोग उनसे दूर ही रहना । एक दिन दोपहर में अजय के कमरे पर कई लड़के बैठ कर गप्पे मार रहे थे , तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी । अजय ने दरवाजा खोला तो देखा सामने उसके पिता जी खड़े है । वो अन्दर आये तो अजय ने दोस्तों से इशारे में कहा की वो लोग बाहर चले जाये पर किसी ने गौर नहीं किया । अजय के पिता जी ने अन्दर आ के सबसे नाम पूछा और हाथ मिलाया और अजय को पैसे देते हुए बोले "अजय , मैं कुछ ले के आ नहीं पाया , पास में कोई दुकान हो तो सबके खाने के लिए कुछ मिठाई -समोसे ले आयो , तब तक मैं तुम्हारे दोस्तों से बात करता हूँ "। अजय ने अपने दोस्तों से फिर इशारे से जाने के लिए कहा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, एक दोस्त ने देख लिया तो वो अजय से बोला " मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ "।

अजय अपने दोस्त के साथ सामान लेने चला गया तो अजय के पिता जी ने अपने जेब से एक सिगरेट का पैकेट निकला और इधर -उधर जेब में हाथ डाल माचिस खोजने लगे । एक लड़के ने पूछा "अंकल माचिस खोज रहे है, वो अलमारी पर रखी है" । अजय के पिता जी ने सिगरेट सुलगाली और पीते हुए बाते करने लगे फिर अचानक उन्होंने अजय के दोस्तों से पूछा क्या तुम सिगरेट पीते हो तो सबने मना कर दिया, पर जब सिगरेट के धुएं से एक-दो दोस्तों को तलब लगने लगी, तो बोले अच्छा अंकल जी हम चलते है । तब अजय के पिता जी बोले "अरे यार बाहर जा के सिगरेट पियोगे ना ,यहीं पिलो "अजय भी तो पीता मैं जानता हूँ, हमने तो १०वीं से ही सिगरेट पीना शुरू कर दिया था ". अंकल की बात सुन कर, अजय के दो दोस्तों ने अंकल से सिगरेट लेकर सुलगाली और फिर तो बातों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ की लड़के भूल गए की वो एक दोस्त के बाप से बात कर रहे हैं ।

हर तरह की बाते उन्होंने अंकल जी से कर डाली और अजय के पिता जी भी बड़े मजे के साथ उनसे बात कर रहे थे । अजय के दोस्तों और पिता जी का शाम को बाहर खाने-पीने का भी प्रोग्राम बन गया । सबने अपने और अजय के बारे में भी सारी बाते अजय के पिता जी को बता दी , की किसकी कितनी गर्लफ्रेंड है ,कौन कितनी सिगरेट और शराब पीता है , कौन कालेज छुट्टी कर फिल्म देखने जाता है, आदि-आदि ।

जब अजय वापस आया तो कमरे के बाहर आती आवाज से उसे पता चल गया की, आज तो मैं गया , अन्दर सारे मौजूद है , उन्हने पता नहीं क्या-क्या पापा से बताया होगा । दरवाजा खटखटाया तो , उसके पापा ने दरवाजा खोला । अजय ने अन्दर देखा कमरे में सिगरेट का धुवाँ भरा हुआ है और उसका एक दोस्त आराम से सिगरेट पीते हुए बात कर रहा है। अजय के पिता जी ने सबको मिठाई दी और कहा की अब वो थोडा आराम करना चाहते है, तो शाम को मिलेगे । अजय के दोस्त अजय से ये कहते हुए गये की "तुम्हारे पापा कितने अच्छे है "। दोस्तों के जाने के बाद अजय के पिता जी ने बेल्ट निकाली और अजय को दम भर के मारा और बोले अगर अगली बार आया और पता चला की तुम ये सब करते हो तो पढाई छुडा के घर बैठा दूंगा ।

पिता जी के जाने के बाद अजय अपने दोस्तों के पास गया और बोला की "मैंने तुम्हे बताया था की , मेरे पापा बहुत खतरनाक है फिर भी तुम लोग उनके सामने सिगरेट पी रहे थे और उन्हें मेरे बारे मने सब कुछ बता दिया "। दोस्त बोले "सिगरेट तो तुम्हारे पापा ने ही हमें ऑफर की थी और वो कह रहे थे की उन्हें सब पता है तुम्हारे बारे में " । अजय बोला "मेरे पापा ना सिगरेट पीते है और ना शराब , वो तो तुम लोगों से सब पता करने के लिए ऐसा किया और तुम बेवकूफ लोग उनके जाल में आ गये और सब कुछ बक दिया" ।

बाप बाप है , बेटा बेटा ही है !
(कहानी सत्य घटना पर आधारित है )

16 अप्रैल, 2009

बाबा जी और भक्त

देश में बच्चे कम और बाबा ज्यादा पैदा हो रहे है, आश्चर्य की बात जितने बाबा उससे ज्यादा भक्त है । भक्त तो ऐसे पागल है की पूछिये मत, बाबा नहीं भगवान है बाबा । बाबा अनंत , बाबा की लीला अनंता ।

एक बार एक बाबा जी का ३ दिवसीय प्रवचन एक बड़े शहर के छोटे कस्बे में था । क़स्बा शहर से ४०-५० किलोमीटर दूर था । प्रवचन के पहले दिन बाबा का एक भक्त प्रवचन शुरू होने से पहले आया और बाबा जी के चरणों में १००००१ रूपये की भेंट चढाई और बाबा जी से आशीर्वाद ग्रहण किया । बाबा जी ने भक्त से पूछा की वो कहाँ से आया है तो भक्त ने बताया की वो दिल्ली में व्यवसाई है और इस शहर में उसका पैतृक निवास है । उसने बाबा जी को अपने निवास पर भी आमंत्रित किया पर बाबा जी ने मना कर दिया, बोले इस बार संभव नहीं है, वो अगली बार जब आयेगे तो जरुर जायेंगे ।

भक्त ने बाबा जी का प्रवचन प्रथम पंक्ति में बैठ कर सुनने के लिए , आयोजक से २५००० प्रतिदिन के हिसाब से 75000 रुपये देकर , बाबा जी के कागजी ट्रस्ट के नाम रसीद कटवा ली । प्रथम दिन भक्त ने बड़े श्रद्धा -भाव के साथ बाबा जी का प्रवचन सुना, जाते समय भी बाबा जी के चरण छूकर गया और आयोजक से बोला की अगली बार बाबा जी के आने , रहने और पंडाल की वयवस्था उसके तरफ से होगी ।

भक्त एक महंगी गाड़ी से आया हुआ था, साथ में एक अंगरक्षक भी था , अच्छा चढावा भी चढाया था , इन बातों से बाबा जी को लग गया की भक्त एक मोटा असामी है । अगले दिन प्रवचन में भक्त प्रवचन शुरू होने के बाद आया । प्रवचन खत्म होने पर भक्त, बाबा जी से मिला और बताया की महाराज बिजनेस की वजह से दिल्ली जाना पड़ा था लेकिन वहां से काम खत्म कर के वापस आ गया हूँ , अब कल शाम को आपका प्रवचन सुन कर ही वापस जाऊंगा , आपको गुरु बनाते ही मेरे कष्ट दूर होने लगे है , एक डूबा हुआ धन वापस आ गया है , आयोजक लोगों से कह दीजिये की जितना खर्च हो रहा है , उसका आधा पैसा मैं दूंगा । बाबा खुश थे ऐसा भक्त पाकर .

अंतिम दिन प्रवचन में बहुत भीड़ हुई , लोगो ने बहुत नकद चढावा चढाया । लाखों रुपये तीन दिन के भीतर बाबा जी के पास नकद आ गए थे । बाबा जी को रात को शहर से राजधानी पकड़ कर अपने आश्रम वापस जाना था । बाबा जी ने अपने भक्त को बुलया और कहा की यदि उन्हें दिक्कत न हो तो वे उनके साथ स्टेशन चले , नकद ज्यादा है शहर ५० किलोमीटर दूर है और रास्ता भी ठीक नहीं है , अगर २ -३ गाड़ी एक साथ चलेगी तो कोई दिक्कत नहीं होगी ।

भक्त ने आग्रह किया की बाबा जी आप मेरे साथ मेरी गाड़ी में बैठ कर चलिए, रास्ते में मैं आप से बोध -ज्ञान लेता चलूँगा । बाबा मान गए । बाबा ,भक्त ,अंगरक्षक और ड्राइवर एक गाड़ी में और बाकि बाबा के चेले अन्य गाड़ियों में बैठ के रवाना हुए । भक्त का ड्राईवर बहुत तेज गाड़ी चला रहा था , जब पीछे लोग दिखाई देना बंद हो गए तो ड्राईवर ने गाड़ी सड़क से निचे उतार कर सुनसान जगह में लगा दी। बाबा को पता भी नहीं चला , वो तो भक्त को ज्ञान दे रहे थे, भक्त ने बाबा जी के रिवाल्वर लगा दी, बोला बाबा चुप -चाप उतरोगे या गोली चलानी पड़ेगी । बाबा अवाक् , सारा पैसा बाबा जी ने भक्त की गाड़ी में रखवाया था और भात उन्हें गाड़ी से उतार रहा है मतलब ये भक्त नहीं ये तो लुटेरा है । बाबा जी चुप -चाप गाड़ी से उतर गए और उनका भक्त पैसे लेकर गायब हो गया । थोडी देर में जब बाबा जी के चेले अपनी गाड़ी से रास्ते से गुजरे तो देखा बाबा जी पागलो की तरह सड़क पर टहल रहे है, उन्होंने गाड़ी रोकी और जब बाबा जी से पता चला की वो भक्त नहीं एक ठग था , तो सबके होश उड़ गए । बहुत खोजने पर भी वो भक्त (ठग), बाबा जी को नहीं मिला। पुलिस के पास जा नहीं सकते थे , किसी से बता नहीं सकते थे , क्योकि जो धन मिला था उसका हिसाब सरकार को नहीं पता चलना चाहिए था (टैक्स जो नहीं देते )।

भक्त उर्फ़ नटवरलाल बाबा को कई लाख का चूना लगा गया था । न माया मिली न राम , बाबा गए खाली हाथ।

14 अप्रैल, 2009

लखनऊ में शादी

शायद १०-१२ साल पहले की बात है . मैं गाँव गया हुआ था। दादा जी ने बताया की पड़ोस गाँव में उनके एक मित्र है उनके लड़के की लखनऊ में शादी है, शादी में मुझे जाना है (दादा जी घर के अलावा कहीं भी भोजन ग्रहण नहीं करते थे इसलिए वो किसी भी शादी में नहीं जाते थे )। मैं बड़ा खुश हुआ लखनऊ बारात जा रही है तो अच्छी व्यवस्था होगी, खाने को अच्छा व्यंजन मिलेगा ।

मैं और मेरे चचेरे चाचा जी बारात में गए। बारात को ठहराने की व्यवस्था एक ३ सितारा होटल में की गई थी । खास लोगों के लिए कमरे थे और आम लोगों के लिए एक हाल में सोने की व्यवस्था की गयी थी। नाश्ते और खाने की वयवस्था बहुत अच्छी थी, पर गाँव के लोग पहली बार बफे सिस्टम में खा रहे थे, तो उन्हें बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। बफे सिस्टम को कोई गिद्ध भोज, तो कोई कुक्कुर भोज कह रहा था, एक लोगों बोल रहे थे "हम गाय-भैंस है क्या, जो खड़े हो के खाए , इतना पैसा खर्च किया २-४ मेज-कुर्सी ही लगवा देते"। कई लोगों को तो पता ही नहीं चला की वो क्या खा रहे है और बहुत से लोग तो बिना खाए ही रह गए।

रात को देर से सोये, सुबह देर से उठे तो हुआ की दैनिक क्रिया से निवृत हो लिया जाये। टॉयलेट का दरवाजा खोला तो दंग रह गया, अन्दर पाश्चयात शौचालय था, जिसका शायद किसी ने प्रयोग नहीं किया था, बहुत लोग तो फर्श पर ही हलके हो लिए थे, बड़ी हिम्मत करके सोचा पानी डाल के गंदगी बहा देता हूँ, पर बाल्टी और मग को भी लोगों ने भर दिया था। वो तो शुक्र था खाना रात को खाया था, अगर सुबह कुछ खाया होता तो पक्का उलटी कर देता ।

मैंने लड़के के पिता जी से कहा "बाबा, पेट खली करना है, कहाँ जाऊ , "। बाबा बोले " बच्चा, अभी हालत ठीक है तो रोके रहो, नहीं तो बाहर कही हो आओ, यहाँ के सारे टॉयलेट भाई लोगों गन्दा कर दिया है, दरवाजा खोलना मुश्किल है, मनेजर सुबह-सुबह कई लोगों को सुना के गया है"।

मैं और चाचा जी बाहर जा के सार्वजनिक शौचालय से निपट आये। वापस आये तो लोग काफी, पकौडे और जलेबी का नास्ता कर रहे थे। तभी लड़की के भाई को लड़के के बड़े पिता जी (ताऊ ) ने पकड़ लिया और उससे कहने लगे "हलवाई बहुत ख़राब है, देखो चाय का दूध ही जला दिया है, कैसा कड़वा स्वाद आ रहा है"। लड़की का भाई बोला "जी ये चाय नहीं काफी है "।

लड़के के बड़े पिता जी फिर बोले "रात को खाने में भी सुरन (जिमीकंद) की सब्जी भी चीमड़ (सख्त )कर दिया था और एक बात बताओ ये दुई ठो गोभी की सब्जी काहे बनवाए थे "। लड़की का भाई सोच में पड़ गया , सुरन की सब्जी तो बनी नहीं थी, इन्हें खाने के लिए कहाँ से मिल गयी और गोभी तो एक बनी थी दूसरी सब्जी गोभी की कहाँ से आ गयी।

चाचा जी बोले "काका , पनीर की सब्जी को सुरन समझ रहे है और मसरूम वाली सब्जी को भी गोभी समझ रहे हैं "। लड़की का भाई अभी कुछ बोलता उससे पहले लड़के के बड़े पिता जी बोले उठे "ये पनीर तो नाम सुने है और जानते है पर इ मसरूम का है "।

चाचा बोले "काका , कुकुरमुत्ता जो खाने वाला होता है उसे मसरूम बोलते है "। लड़के के बड़े पिता जी "राम राम , तो हमें इ लोग कुकुरमुत्ता खिला दिए"। बड़ी मुश्किल से लड़की वालों ने उन्हें समझाया तब जा के कहीं वो शांत हुए ।

उस शादी से लौटने के बाद अब गाँव का कोई भी बुजुर्ग बड़े शहर की शादी में नहीं जाता है और न ही कोई लेके जाता है ।

08 अप्रैल, 2009

शर्त और अनुभव

उम्र के साथ अनुभव आता है , एक बुजुर्ग व्यक्ति और नवयुवक के बीच जो सोच तथा निर्णय का जो फर्क होता है वो अनुभव के कारण ही होता है ।

शायद आपने ये कहानी सुनी होगी . एक बार की बात है, एक शादी में लड़की वालों ने शर्त रखी की बारात में कोई बुजुर्ग नहीं आयेगे , केवल जवान ही शादी में शामिल होंगे . यह बात जब गाँव के एक बुजुर्ग राम जियावन बाबा को पता चली तो वो बोले "देखो बारात में केवल जवान लोग बुलाये गए हैं तो हो न हो कोई गड़बड़ जरुर है ". लड़के के मित्र बोले "बाबा आपको जाने को नहीं मिल रहा है इसलिए आप ऐसा बोल रहे हो ". राम जियावन बोले "नाहीं बच्चा , कुछ बात है, तभी लड़की वाले ऐसी शर्त रखे हैं ".

लड़के के पिता जी बोले "देखिये रिश्तेदारी में शादी हो रही है तो क्या गड़बड़ होगी. लड़की का भाई तो हमें भी आने से मना कर गया है ". राम जियावन बोले "देखो भैया , हम तो शादी में जायेंगे ". लड़के के पिता जी बोले "ठीक है राम जियावन आप लड़को से पूछ लीजिये की वो आप को ले के जायेंगे की नहीं ". लड़को ने मना कर दिया की हम बाबा को लेके नहीं जायेगे .

बाबा ने लड़के के छोटे भाई को बुलाया और कहा "देखो , हम शादी में जायेंगे और ये बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए". लड़के भाई भाई बोला "पर आप जायंगे कैसे ". बाबा बोले "वो जो कपडे और सामान वाला बक्सा जा रहा है , वैसे ही एक बक्से में हम बैठ के चले जायेंगे और वो बक्सा तुम गाड़ी से निचे मत उतरवाना ".

शादी का दिन आ गया ,केवल जवान लड़के ही बारात में शामिल हुए और बाबा बक्से में बैठ कर चल दिए . बारात लड़की के दरवाजे पर पहुंची तो बड़ी आव-भगत हुई लोग बड़े खुश वाह मज़ा आ गया कोई बड़ा नहीं है जम के खायो-पियो . नाश्ते के बाद जब रात में खाने का समय आया तो लड़की का भाई आया और बोला "भोजन तैयार हो गया है पर एक सब्जी बनना बाकी रह गयी है अगर उसे आप लोग बना ले तो आप भोजन कर सकते है अन्यथा आपको भोजन नहीं मिलेगा ".

दुल्हे के दोस्त बोले "अरे इतने लोग है सब्जी तो आराम से बन जायेगी बस आप सब सामान दे दीजिये". लड़की का भाई एक बड़ा सा मटका, जलाने के लिए लकडी और सामान ले आया और बोला "इस मटके में कोहडा (कद्दू ) है आप लोग इसकी सब्जी बना लीजिये शर्त ये है की ये मटका टूटना नहीं चाहिए ". अब सारे लड़के सोच में पड़ गए की बिना मटके को तोडे कोहडा (कद्दू ) बहार कैसे आएगा और उसकी सब्जी कैसे बनेगी .तभी किसी ने लड़की के भाई से पूछा "महाराज , ये कद्दू इस मटके में गया कैसे ?". लड़की का भाई बोला जब कद्दू बहुत छोटा था तभी उसे मटके में डाल दिया था , धीरे-धरे कद्दू बढता गया और अब वो मटके जितना बड़ा हो गया है ".

सारे युवक परेशान की अब सब्जी कैसे बनेगी ,और सोचने लगे "यही बात थी तभी बुजुर्गो को आने से मना किया था ".जब सब सोच के थक गए तो दुल्हे के छोटे भाई को याद आया की बक्से में तो राम जियावन बाबा है , उन्ही से पूछ के आते है . वह बाबा के पास जाता है और बाबा को पूरी कहानी बताता है , बाबा पूरी कहानी सुन कर बोलते है "बस इतनी सी बात ". लड़का बोलता है "हम बहुत देर से परेशान है और आप कह रहे हैं इतनी सी बात , बताइए सब्जी कैसे बनेगी ". बाबा बोले "कद्दू को मटके में ही रहने दो, मटके को आग पर रख पर पकाना शुरू करो, थोडा पानी डाल देना मटके में जब पानी मर्म हो जाये तो कद्दू को लकडी से मार के फोड़ देना और फिर नमक -मसाला डाल के पका देना , सब्जी बन जायेगी ". लड़के ने बाबा की बताई हुई बात पर अमल किया ,थोडी मेहनत के बाद सब्जी तैयार हो गयी तो लड़की वालो को खबर कर दी गयी .

लड़की के पिता जी आये और जब उन्होंने देखा की लड़को ने सब्जी बना दी है तो उन्होंने कहा "हो न हो , आप लोगों के साथ कोई बुजुर्ग जरुर आया है वरना आप को कैसे पता चला की कद्दू की सब्जी बिना कद्दू को काटे हुए भी बन सकती है ". लड़के पहले मना करते रहे की उनके साथ कोई बुजुर्ग नहीं आया है पर जब वो लोग नहीं माने तब दुल्हे के भाई ने बताया की राम जियावन बाबा आये हैं और वो बक्से में बैठे हुए हैं . लड़की के पिता जी बोले "ऐसा अनुभव केवल बुजुर्ग व्यक्ति के पास ही हो सकता है ".

31 मार्च, 2009

हमारे पडोसी

पडोसी की जागरूकता और हितेषीपन कैसा होता है ये तो सब जानते है । एक कंपनी वाले तो ये कहते है की "आप किसी भी बात को अपने पडोसी से मत बताओ क्योंकि पडोसी, कभी भी आप का भला नही चाहेगा ।" अब वे ऐसा क्यों कहते है पता नहीं पर कुछ ऐसा हादसा हुआ की हमने भी जान लिया की दूर गाँव का आदमीं अच्छा है पर पडोसी नहीं ।

वाक्या ऐसा है की हम चार दोस्त(मैं , राहुल , नविन और सतेन्द्र ) सेक्टर १७ वसुंधरा गाजियाबाद में एक तीन कमरे का फ्लैट किराये पर लेके रहते थे। उस समय जयपुरिया इंस्टिट्यूट से ऍम सी ए कर रहे थे। बाहर के खाने से तंग आकर हमने घर में ही खाना बनाना शुरू कर दिया था। सतेन्द्र का घर सबसे पास में था वो रुड़की का रहने वाला था। उसके मम्मी-पापा एक दिन आके हमें सारा रसोई का सामान दिलवा गए थे। हम भी छुट्टियों में सतेन्द्र के घर चले जाते थे ।

खाना बनाने में सबसे मुश्किल काम होता था रोटी बनाना जिसे कोई नहीं चाहता था इसलिए हमने आपस में पारी बांध दी थी एक सप्ताह की। एक दिन दोपहर में सतेन्द्र की दीदी का फ़ोन आया की वो शाम को आ रही है कल उन्हें दिल्ली में कुछ काम है। दीदी के आने पर हम बड़े खुश थे की चलो आज अच्छा खाने को मिलेगा और कुछ करना भी नहीं पड़ेगा। दीदी ने पनीर की सब्जी और रोटी और चावल बनाये, रात के १० बज चुके थे और हम खाने जा ही रहे थे की दरवाजे की घंटी बजी।

नविन ने दरवाजा खोला तो देखा एक दरोगा, दो सिपाही के साथ दरवाजे पर खडा है। दरोगा ने अन्दर घुसते ही पूछा "यहाँ कौन-कौन रहता है?" नविन बोला "जी हम चार लोग रहते है"। दरोगा ने फिर पूछा "क्या काम करते हो "। नविन बोला" जी, जयपुरिया में पढ़ते है "। दरोगा बोले "आइकार्ड दिखाओ"। हमने अपने आइकार्ड दिखाए । फिर उसने पूछा "ये लड़की कौन है" । सतेन्द्र बोला "सर , मेरी दीदी है "। दरोगा बोले "तेरी सगी बहन है "। सतेन्द्र बोला "हाँ, जी "। तब एक सिपाही सतेन्द्र को लेके बाहर चला गया। दरोगा ने दीदी से पूछा "तुम्हारे मामा हैं ?" दीदी बोली "हाँ हैं "। दरोगा ने फिर पूछा "नाम क्या है उनका ?" दीदी ने मामा जी का नाम बताया । तब तक वो सिपाही जो सतेन्द्र को लेके बहार गया था अन्दर आ गया, सतेन्द्र अभी बाहर ही था । सिपाही ने दरोगा के कान में कुछ बोला उसके बाद , दरोगा साहब ने सतेन्द्र को अन्दर बुला लिया और बोले "ज्यादा घुमा-फिरा मत किया करो आराम से पढो-लिखो" इतना कह के वो चले गए ।

अब सतेन्द्र गुस्से में था की ये पुलिस वाले क्यूँ आये थे , किसने फ़ोन करके इन्हें बुलया था । राहुल बोला शांत हो जाओ जिसने भी बुलाया होगा, देख अभी थोडी देर में आ रहा होगा।

५ मिनट बीते होगे की लगभग एक ३५ वर्षीय आदमी दरवाजे पर आ गया। बोला "जी मैं आपके निचे वाले फलैट में रहता हूँ , ये पुलिस वाले क्यों आये थे ?"। सतेन्द्र बोला "जी, वो तो भैया है हमारे यही इन्द्रपुरम थाने में हैं तो मिलने आये थे ". उस आदमी का चेहरा अजीब सा हो गया । फिर बोला "आप कितने लोग रहते है ?" सतेन्द्र बोला "१० लोग रहते है , अभी ६ घर गए हैं बाकी ४ हैं "। वो आदमी फिर बोला "क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ "। सतेन्द्र बोला "नहीं , आप अन्दर नहीं आ सकते है "। वो बोला "क्यों "। सतेन्द्र बोला "आप हैं कौन , न तो आप मेरे मकान मालिक है और नहीं आप सोसायटी इन्चार्ग"। वो बोला "मैं आप का पडोसी हूँ "। सतेन्द्र बोला "हमने तो आप को कभी नहीं देखा , क्या पता आप चोर हो "। अब वह आदमी गुस्से में आ गया था , बोला "आप लोग लड़की ले के आये है "। सतेन्द्र बोला" हाँ ,लेके आये हैं तो क्या कर लोगे", आदमी बोला "वो पुलिस वाले तो आपके भैया नहीं थे, मैंने चौकी में फ़ोन करके उन्हें बुलया था पर आप लोगो ने शायद लड़की को कही छुपा दिया होगा" तब तक राहुल बोल पड़ा "देखिये आप तमीज इस बात कीजिये हमारी दीदी आई हुई हैं "। वो आदमी बोला "अच्छा आप की बड़ी बहन है, मुझे लगा की आप लोग लड़की लेके आये हैं, इसलिए मैंने चौकी फ़ोन करके पुलिस वालो को बुलाया था" अब सतेन्द्र का गुस्सा भड़क उठा था बोला "क्या लड़को के घर में माँ -बहन , मौसी, बुआ, चाची नहीं आ सकती। आपने फ़ोन करने से पहले एक बार पता तो कर लिया होता। चले जाओ यहाँ से वरना एक लात मरूँगा सीढ़ी से निचे गिर जावोगे" वो आदमी चुप-चाप निचे चला गया।

21 मार्च, 2009

सुरेन्द्र जी का सबक

सुरेन्द्र जी ने रायबरेली से आने के बाद अपना कमरा बदल लिया, जहाँ पर एक सामूहिक स्नानागार और शौचालय था । कमरे में सब कुछ तो ठीक था पर सामान रखने के लिए कोई अलमारी नहीं थी, सुरेन्द्र जी अपना तेल, साबुन इत्यादि सामान खिड़की के ऊपर रखते थे । एक दिन सुबह उन्होंने अपना साबुन उठाया तो वो गिला था उन्हें लगा शायद कही से पानी गिर गया होगा, पर अगले दिन जब साबुन फिर गिला था, तो उन्हें शक हुआ की हो न हो कोई मेरा साबुन इस्तेमाल कर रहा है ।

उन्होंने ने सबसे पूछा "का हो केहू हमार साबुन लगावत हो का"। सबने मना कर दिया। अगले दिन वो सुबह ४ बजे उठ गए और देखने लगे की आज देखता कौन मेरा साबुन ले के जाता है , तभी उन्हें एक परछाई दिखाई देती है जो उनका साबुन ले के जा रही है, थोडी देर बाद उसने साबुन लाकर वहीँ रख दिया, लेकिन वो आदमी बगल वाले कमरे गया ये बात सुरेन्द्र जी को पता चल गयी।

सुबह उन्होंने बगल के कमरे में रहने वाले राम आसरे से पूछा "का हो तू हमार साबुन लगावत हो"। राम आसरे बोले "अरे सुरेन्दर भईया, हम त बिना साबुन के नहाईला , हम तोहार साबुन काहे लगाइब"।

सुरेन्द्र जी ने अब रंगे हाथो चोर को पकड़ने की सोची। उन्होंने एक नया साबुन लाकर वहीँ पर रख दिया। अगले दिन फिर कोई साबुन लेके गया, पर बहुत देर बाद उसने साबुन लाके वहां पर रख दिया। सुरेन्द्र जी ने एक दो लोगों को इकठा किया और हर कमरे के लोगो से जाकर मिलने लगे , अंतिम कमरा राम आसरे का था पर वो दरवाजा ही नहीं खोल रहा था । जब उन्होंने ने धमकी दी दरवाजा नहीं खोलोगे तो तोड़ देंगे तो , राम आसरे ने दरवाजा खोल दिया ।

राम आसरे को देखते सबकी हंसी छुट गयी , रामआसरे के सर, हाथ, भौह और पलकों के बाल गायब थे . हुआ ये था कि सुरेन्द्र जी ने बालसफा साबुन लाकर रख दिया था। सुरेन्द्र जी ने फिर कहा "जब हम कल तोहसे पूछे की हमार साबुन लगावत हो, त तू मना कई दिहो, इही खातिन हम इ बालसफा साबुन ले के आ ये रहे की, अब जे साबुन लगावत होए रँगे हाथे पकडा जाये। कल तू सच बोल दिहे होता त, का हम तोहके गोली थोड़े मार देते , पर तू झूठ बोले उही का इ सजा बा की अब तब महिना भर केहू के आपन चेहरा न दिखैबो और जिनगी भर चोरी कइके कौनो काम नहीं करबो ।"

उसके बाद से सुरेन्द्र जी का कोई समान बिना पूछे किसी ने कभी नहीं लिया , इतना खतरनाक सबक जो उन्होंने दिया था ।

18 मार्च, 2009

इलाहाबाद से रायबरेली

मेरे गाँव में एक सुरेन्द्र जी है. वो अपने साथ घटी एक घटना अक्सर सुनाते हैं , वो मैं आज आप को सुनाने जा रहा हूँ .

करीब १५-२० साल पहले की बात है , सुरेन्द्र जी इलाहाबाद में रह कर सरकारी नौकरी की तैयारी करते थे . घर से ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे तो उन्होंने प्रयाग स्टेशन के पास एक कमरा किराये पर लिया हुआ था . कमरे के अलवा और कुछ नहीं था , ना रसोई और ना ही शौचालय.

दैनिक क्रिया-कर्म के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था । घर के सामने से रेलवे लाइन जाती थी । जैसा की हमें पता ही है की रेलवे पटरी के किनारे स्थाई शौचालय के तौर पर प्रयोग किये जाते हैं ।सुरेन्द्र जी भी पटरी पार करके निपट आते थे ।

एक दिन सुबह उठे तो देखा पटरी पर एक गाड़ी खड़ी है , बहुत देर इंतजार करने पर जब वो गाड़ी नहीं गयी तो उन्होंने सोचा क्योंना डिब्बे के अन्दर से होते हुए उस पार चले जाये । लोटा ले के ये गाड़ी के अन्दर चढ़ गए तो उन्हें सामने डिब्बे में बना शौचालय दिख गया , मन में विचार किया की कहा बाहर जाये गाड़ी बहुत देर से खड़ी है इसी में निपट लेते हैं .

अभी वे शौचालय का प्रयोग कर ही रहे थे की गाड़ी चल दी . जब तक वो बाहर आकर उतरते तब तक गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली , गाड़ी कोई सुपर फास्ट थी जो इलाहाबाद से चलकर सीधे रायबरेली में रुकती थी (इलाहाबाद से रायबरेली १२० किमी दूर है ).

अब सुरेन्द्र जी परेशान लुंगी और बनियान पहने हाथ में लोटा लिए , डर रहे की कहीं टी टी आ गया तो क्या करेगे । करीब डेढ़-दो घंटे बाद वो रायबरेली पहुँच गए , अब कहाँ जाये इस हालत में .

उनके एक चचेरे भाई रायबरेली में रहते थे, उनका पता उन्हें याद था . पहुँच गए उनके घर, उनकी भाभी जी ने दरवाजा खोला और उन्हें इस हालत में देख कर उन्हें लगा की कुछ अनिष्ट हुआ है जिसकी सुचना देने ये हड़बडी में ऐसा लुंगी-बनियान में आ गए हैं और उन्होंने रोना शुरू कर दिया . रोने की आवाज सुन उनके भाई बाहर आये तो सुरेन्द्र जी ने पूरा हाल उन्हें सुनाया की किस तरह से वो इलाहाबाद से रायबरेली पहुँच गए .

उनके भाई ने उन्हें रोक लिया बोला "कल सुबह ट्रेन पकड़ के चले जाना आज यहीं रुक जाओ" .उधर शाम हो गई और सुरेन्द्र का कोई पता नहीं , घर का दरवाजा खुला हुआ (सुरेन्द्र जी ने सोचा था की अभी १० मिनट में आ जाऊंगा तो क्या ताला बंद करू )अगल-बगल वाले खोज करने लग गए जब वो कहीं नहीं मिले तो हुआ की कल सुबह चल के थाने में गुमशुदा की रिपोर्ट दर्ज़ करा देंगे .

अगले दिन सुबह जब सुरेन्द्र जी अपने कमरे पर पहुंचे तो उन्हें पता चला की अगर वो कुछ समय और देर से आते तो उनके गुम होने की रिपोर्ट थाने में लिखवा के उनके घर पर खबर कर दी जाती . जब उन्होंने अपने साथ हुई घटना सबको सुनाई तो सबका हँसते - हंसते बुरा हाल था , एक बोले अच्छा हुआ ट्रेन रायबरेली रुकती थी कही दिल्ली जा के रुकती तो वापस भी नहीं आ पाते.

03 मार्च, 2009

वो होली की सुबह

होली आने वाली है और मुझे उस आदमी का चेहरा फिर याद आने लगा है । वर्ष २००६ की बात है । मैं उस समय गाजियाबाद में रहता था । दो दिन बाद होली थी, मैं अपने घर जौनपुर जाने की तैयारी कर रहा था पर अचानक मेरे सर में तेज दर्द होने लगा और हल्का - हल्का बुखार भी होने लगा तो मैंने घर पर फ़ोन करके माता जी से बोला दिया की "तबियत ठीक नहीं है इसलिए कल सुबह यहाँ से चलूँगा "। जब बुखार बहुत तेज हो गया तो मैंने अपनी बुआ जी (जो गाजियाबाद में ही रहती थी ) को फ़ोन कर के बताया की मेरी तबियत ठीक नहीं है और अपने एक मित्र को मैंने अपने पास बुला लिया ।

मेरे मित्र ने आने के बाद मुझसे कहा की अगर तबियत ठीक नहीं है तो चलो डॉक्टर को दिखा लो । मैंने कहा "मेरे पास हिम्मत नहीं है की डॉक्टर के पास जाऊँ , तुम जाके दवा ले आओ "। रात को बुआ जी आयीं और उन्होंने बुखार उतारने के लिए ठंडे पानी की पट्टिया मेरे सर पर रखीं और बोला की अगर ज्यादा दिक्कत हो तो फ़ोन करना हम आ जायेगे ।

सुबह बुआ जी फिर आयीं मुझे देखने के लिए पर मुझे कुछ पता नहीं था , क्योंकि मैं बेहोश हो चुका था । इस बात का पता मेरे मित्र को भी नहीं था, उसे लगा की मैं सो रहा हूँ । बुआ जी ने पास के ही एक निजी चिकित्सालय में मुझे भर्ती करवा दिया पर कई घंटे बीत जाने पर जब मुझे होश नहीं आया और मेरे रक्त का दबाव कम होता जा रहा था , तो चिकित्सालय के मालिक ने एक वरिष्ठ चिकित्सक को बुला कर मुझे दिखाया । चिकित्सक ने देखा की मेरे शरीर पर कुछ दाग के निशान आ गए हैं तो उन्होंने बताया की ये मेनिन्गोक्समिया नामक बीमारी हो सकती है , यह बीमारी इस समय दिल्ली और आस पास के इलाको में फैली हुई है ।चिकित्सक के परामर्श पर मुझे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया ।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मेरा इलाज शुरू हो गया, रात होते - होते मुझे होश आ गया । होश आने पर मैंने अपने आप को अस्पताल के एक कमरे में पाया ,कमरे में केवल तीन लोग थे । मैं बीच में था, मेरे दायीं तरफ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो बेहोश था और बायीं और एक १०-१२ साल की बच्ची थी । कमरे में जो भी नर्स या डाक्टर आते मुहं पर हरे रंग की पट्टी बांध कर आते , मैंने नर्स से पूछा की मुझे क्या हुआ है और मेरे घर वाले कहा हैं ? नर्स ने बताया की मुझे मेनिन्गोक्समिया बीमारी है और यह बीमारी छूने , बोलने और किसी भी तरह सम्पर्क में आने पर दुसरे व्यक्ति को हो सकती है इसलिए आप के पास किसी को आने की अनुमति नहीं है । हाँ अगर कोई मिलना चाहे तो एंटीबैटिक दवा खा के आप से थोडी देर के लिए मिल सकता है। मैंने फिर पूछा की "मुझे यहाँ कब तक रहना होगा?" तो उन्होंने बताया की आप की टेस्ट रिपोर्ट कल शाम को आएगी उसके बाद ही कुछ पता चलेगा। उसने बताया की इस बीमारी में अगर २४ घंटे के अन्दर सही इलाज शुरू न हुआ तो शरीर के सारे अंग ख़राब होने लगते है और तीन दिन के अन्दर इन्सान की मौत हो जाती है ।

सुबह होने पर देखा माता जी और पिता जी घर से आ गए थे , बुआ जी ने बताया की "वो और मेरे कुछ मित्र कल से यही पर हैं लेकिन तुम्हारे पास किसी का ज्यादा देर तक रहना मना है इसलिए वो बाहर थे" । तभी मेरे बगल के लोगों से मिलाने उनके घर वाले आ गए थे । वह आदमी जो मेरे दायी ओर था उसे अब थोडा होश आ गया था और वह घर जाने की बात कर रहा था , वह कह रहा था की "अगले महीने उसकी बेटी की शादी है उसे बहुत काम है"। उसकी पत्नी उन्हें समझा रही थी पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था । वह आदमी बात करते - करते चिल्लाने लगता था और फिर बेहोश हो जाता था ।

उसकी पत्नी ने बताया की वो मेरठ के रहने वाले है , उसकी दो लड़कियां है अगले महीने बड़ी की शादी है , तीन दिन पहले उसके पति को बुखार आया था तो वही के डॉक्टर से इलाज करवा रहे थे पर कल शाम को जब डाक्टर ने जवाब दे दिया तो यहाँ ले के आये हैं ।

शाम को मेरी रिपोर्ट आ गयी थी , डाक्टर ने बताया की कल सुबह मुझे सामान्य वार्ड में भेज दिया जायेगा क्योंकि मेरा इलाज सही समय पर शुरू हो गया इसलिए रक्त और त्वचा को छोड़ कर शरीर के किसी अंग को नुकसान नहीं हुआ है।

रात के करीब १० बज रहे थे , अचानक मेरे बगल लेटा आदमी उठ जाता है और मुझे बहुत काम करना है कह कर बाहर भागने लगता है , अस्पताल के कर्मचारी उसे पकड़ के वापस लाते हैं । उस आदमी को वो लोग चारपाई से बांध देते है जिससे वो दुबारा न भाग पाए । डाक्टर आके उसे देखते है और नर्स से कुछ सुई लगाने को कहते है । नर्स के सुई लगाने पर वह आदमीं फिर शांत हो जाता है ।

रात के करीब २ बज रहे होगे तभी एक तेज चिल्लाने की आवाज आती है , मैं उठ के देखता हूँ तो उस आदमी ने रस्सी तोड़ दी है और उठ के बैठ गया है , मैं सोचता हूँ की आखिर इसने ये रस्सी कैसे तोड़ दी , मैं उससे बात करने की कोशिश करता हूँ पर तभी वो वापस लेट जाता है । डाक्टर और नर्स आते हैं और उसको देखने के बाद डाक्टर बोलते है की "इसके घर वालो को बुला दो ये मर चुका है" । उसकी पत्नी आती है और अपने पति की लाश देख कर रोना शुरू कर देती है , तभी अस्पताल के कर्मचारी आते है और बोलते हैं की अभी ३ बज रहे हैं आप इनको लेके अभी निकल जाओ वरना सुबह होने पर होली होने के कारण कोई गाड़ी मेरठ नहीं जा पायेगी । मेरे आँखों के सामने उस आदमी को सफ़ेद कपडे में सिल के एक बड़े प्लास्टिक बैग में डालके बाहर लेके चले जाते हैं ।

मुझे अपनी शंका का समाधान मिल जाता है की वो रस्सी उसने नहीं तोड़ी बल्कि वो उसकी प्राण वायु थी जो उसे छोड़ के जा रही थी । होली आने वाली है और मुझे उस आदमी का चेहरा फिर याद आने लगा है।

27 फ़रवरी, 2009

सुनो सब की करो अपने मन की

अब ऐसा नहीं की मन जो कहे आप वही करने लगे , मन बड़ा चंचल होता है उसकी सुने लेकिन निर्णय दिमाग को करने दे ।आप ने महसूस किया होगा जो काम आप मन लगा के करते है उस काम को करने में आप थकान,आलस्य नहीं महसूस करते बल्कि आप बड़े उत्साह और तेजी के साथ उस काम को करना चाहते हैं पर जब कोई काम बिना मन के किया जाता है तो थोडा ही करने के बाद आप आलस्य और थकान महसूस करने लगते हैं और उस काम को और करने की इक्क्षा ख़त्म होने लगती है, हाँ अगर कार्य करते हुए अगर कुछ रोचक हो जाता है तो बात अलग होती है ।

हाँ तो मैं बात कर रहा था "सुनो सब की करो मन की" तो अब आप को एक कहानी सुनाता हूँ शायद ये कहानी आप ने पहले भी सुनी या पढ़ी होगी .

एक बार एक बाप - बेटा खच्चर पे सामान ले के कही दूर जा रहे थे , थोडी दूर जाने पर बाप ने बेटे से कहा की तुम खच्चर पे बैठ जाओ मैं पैदल चलता हूँ । बेटा खच्चर पे बैठ जाता है तभी उधर से कुछ लोग गुजरते है और कहते हैं " कैसा नालायक बेटा है खुद खच्चर पे बैठा है और बाप पैदल चल रहा है "। बेटा उनकी बात सुनता है और खच्चर से उतरकर अपने पिता को बैठा देता है । थोडी दूर जाने पर कुछ और लोग मिलते है और बोलते है "कैसा पिता है खुद आराम से खच्चर पे बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है "। बाप जब ये सुनता है तो वो अपने बेटे को भी खच्चर पे बैठा लेता है . थोडा और आगे जाने पर कुछ लोग मिलते है और कहते है "अरे तुम कैसे इन्सान हो दोनों इस खच्चर पे बैठे हो ,बेचारे खच्चर की जन लोगे क्या ".ऐसा सुन कर दोनों बाप बेटे उतर कर पैदल चलने लगते है . रस्ते में फिर उन्हें एक आदमी मिलता है और बोलता है "कैसे पागल है, खच्चर होते हुए भी पैदल चल रहे हैं ". अब बाप-बेटे का दिमाग ठनक जाता है की कैसे लोग है दुनिया में हर चीज पर अलग - अलग राय देते हैं , किसी भी तरह जीने नही देते . फिर बाप बोलता है बेटा इस संसार में सुनना सबकी पर करना वही जो तुम्हारा दिल और दिमाग कहे .

हमें अक्सर अपने आस-पास कुछ लोग मिल जाते है जो मुफ्त में सलाह देते है पर उनकी सलाह कितनी सही है ये तो हमें ही जाचना होगा . तो इसलिए सुनिए सब की पर करिए अपने मन की . जब आप कोई काम अपने मन से करेगें तो उसकी सफलता और असफलता पर केवल आप का अधिकार होगा .

"उठो , जागो जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो तब तक रुको नहीं " विवेकानंद


23 फ़रवरी, 2009

ॐ नमः शिवाय ( शिव महिमा )


ॐ नमः शिवाय

एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकार को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़फ रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान् शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

13 फ़रवरी, 2009

जीवन में विकल्प जरुरी है

एक बार एक राजा ने अपने दो सैनिको को मृतुदंड की सजा सुनाई. तो पहले सैनिक ने राजा से बहुत विनती की कि "उसे मृतुदंड न दिया जाए" पर राजा ने उसकी बात नही सुनी। तब दुसरे सैनिक ने राजा से कहा "महाराज मैं एक ऐसी विद्या जानता हूँ ,जिससे आप का घोड़ा उड़ने लगेगा"(उसे पता था की राजा को अपने घोडे से बहुत प्रेम है). राजा ने कहा कि "मैं कैसे मानु की तुम सही बोल रहे हो". सैनिक बोला "महाराज आपने ने मुझे मृतुदंड दिया है अगर मैं मर गया तो ये विद्या मेरे साथ खत्म हो जायेगी और वैसे भी एक मरने वाला आदमी कभी झूठ नही बोलेगा".राजा बोला "ठीक है मैं तुम्हे एक वर्ष का समय देता हूँ अगर तुमने मेरे घोडे को उड़ना सिखा दिया तो तुम्हे जीवन दान मिल जाएगा अन्यथा तुम्हे मौत मिलेगी". सैनिक इस बात पे तैयार हो गया .
राजा के जाने के बाद पहले सैनिक ने दुसरे से पूछा "क्या तुम्हे वाकई में ऐसी विद्या आती है ". दुसरे ने बोला "नही! मुझे ऐसी कोई विद्या नही आती ". पहले ने फिर पूछा "फ़िर तुमने राजा से झूठ क्यों बोला की तुम उनके घोडे को उड़ना सिखा दोगे". दूसरा सैनिक बोला "अगर मैं ऐसा नही बोलता तो मैं आज ही मार दिया जाता पर अब मेरे पास एक वर्ष का समय है ". पहले ने फिर पूछा "लेकिन एक वर्ष बाद जब तुम घोडे को उड़ना नही सिखा पायोगे तो तुम्हे मार दिया जाएगा". दूसरा सैनिक बोला " मेरे पास अब चार विकल्प है "
१ . एक वर्ष के अन्दर राजा मर सकता है .
२. एक वर्ष के अन्दर घोड़ा मर सकता है .
३. मैं भी मर सकता हूँ .
४. शायद मैं घोडे को उड़ना सिखा ही दूँ ?
पर तुम्हारे पास केवल एक ही विकल्प है कि "आज तुम्हे मार दिया जाएगा".


इस प्रसंग से मैं ये कहना चाहता हूँ कि आप जब भी कोई काम करे तो कम से कम एक से ज्यादा विकल्प आप के पास होने चाहिए अन्यथा आप मुसीबत में पड़ सकते हैं .

12 फ़रवरी, 2009

गुरु - चेला

एक ज्योतिषी और उसका शिष्य एक जहाज पर यात्रा कर रहे थे। अचानक जोरदार तूफान आ गया । लगा अब जहाज डूब ही जाएगा। लोगों में चीखपुकार मच गई। सब जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे । पर जाएं तो जाएं कहां । तब ज्योतिषी ने उन लोगों से कहा कि घबराओ नहीं यह जहाज नहीं डूबेगा। तभी किसी ने ज्योतिषी से पूछा कि उसे कैसे मालूम की जहाज नहीं डूबेगा। उसने बताया कि वह एक ज्योतिषी है और उसे मालूम है की यह जहाज नहीं डूबेगा। लोगों में घबराहट कुछ कम हुई । तूफान गुजर गया और किस्मत से जहाज नहीं डूबा। फिर क्या था, लोगों ने ज्योतिषी को पैसों से लाद दिया ।

जब वे लोग मंजिल पर पहुंच गए तो शिष्य ने पूछा - महाराज, मैं आपका चेला हूं। बीस साल से आपके साथ हूं। मुझे मालूम है की आप इतने ज्ञानी नहीं हैं कि यह जान सकें कि जहाज डूबेगा या नहीं। फिर आपने यह कैसे जाना की जहाज नहीं डूबेगा ?

ज्योतिषी ने जवाब दिया - मैंने कुछ नहीं जाना । मैंने तो बस तुक्का मारा था।

अब शिष्य को गुस्सा आ गया। बोला - आपने तुक्का मारा था ? अगर जहाज डूब जाता तो ?

- तो कुछ नहीं । फिर वहां कुछ पूछने के लिए बचता ही कौन ?

02 फ़रवरी, 2009

प्रेम (जीवन सार )

एक सेठ के पास चार पत्निया थी . उसे अपनी चौथी पत्नी से बहुत ज्यादा प्रेम था वह उसे महंगे आभूषण देता था .वह उसे वो सारी सुख सुविधा देता था जो वह चाहती थी .

वह अपनी तीसरी पत्नी से भी बहुत प्रेम करता था. अपने दोस्तों के बीच उसे दिखा कर वह गर्व का अनुभव करता था लेकिन उसे डर था कि वो कही किसी और के पास न चली जाए .

वह आपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता था .वह बहुत ही विचारवान और सयमी महिला थी जो सेठ के लिए बहुत विश्वास पात्र थी .जब भी सेठ को कोई परेशानी आती थी तो वो अपनी दूसरी पत्नी से सलाह लेता था और वो उसकी मदद करती थी .
सेठ की पहली पत्नी बहुत समर्पित सगनी थी वो उसके व्यवसाय , धन और घर की देखभाल करती थी .सेठ उससे प्रेम नही करता था और उस पर धयान भी नही देता था पर वो सेठ से बहुत ज्यादा प्रेम करती थी.

एक दिन सेठ बीमार पड़ गया और उसे पता चल गया कि वह अब ज्यादा दिन जीवित नही रहेगा । उसने अपने विलासिता भरे जीवन के बारे में सोचा और ख़ुद से कहा "मेरे पास चार पत्निया है पर मरने के बाद मैं अकेला हो जाऊंगा. कितना अकेला हूँ मैं ! " .

तब, उसने अपनी चौथी पत्नी से पूछा "मैंने तुम्हे सबसे ज्यादा प्यार किया है , तुम्हारा हर ख्याल रक्खा है . अब मैं मर रहा हूँ ,क्या तुम मेरा साथ दोगी, मेरे साथ तुम भी ये संसार छोड़ दोगी ?" "कभी नही " ऐसा जवाब देते हुए बिना कुछ और कहे वो वहां से चली गई .

ऐसा जवाब सुन कर सेठ के ह्रदय में धक्का लगा .तब दुखी सेठ ने अपनी तीसरी पत्नी से पूछा "मैं आपने जीवन में तुमसे बहुत प्रेम किया है .अब मैं मर रहा हूँ ,क्या तुम मेरा साथ दोगी, मेरे साथ तुम भी ये संसार छोड़ दोगी ?" "नही!" चौथी पत्नी बोली "यहाँ जिन्दगी बहुत अच्छी है ! तुम्हारे मरने के बाद मैं दूसरा विवाह कर लुंगी!" सेठ का ह्रदय ठंडा पड़ने लगा .

तब उसने अपनी दूसरी पत्नी से पूछा "मैं हमेशा तुम्हारे पास मदद के लिए आया और तुमने हमेशा मेरी मदद की है। अब मुझे तुम्हारी फिर मदद चाहिए .अब मैं मर रहा हूँ ,क्या तुम मेरा साथ दोगी, मेरे साथ तुम भी ये संसार छोड़ दोगी ?" "मैं क्षमा चाहती हूँ , मैं तुम्हारी कोई मदद नही कर सकती हूँ" दूसरी पत्नी बोली "हाँ मैं तुम्हे कब्र तक छोड़ सकती हूँ " ये जवाब सुन कर सेठ को लगा कि एक तूफान आया जिसने उसे तोड़ दिया है .

तभी एक आवाज आती है "मैं तुम्हारे साथ चलूंगी . इससे कोई फर्क नही पड़ता कि तुम कहाँ जा रहे हो" सेठ ने देखा उसकी पहली पत्नी ये कह रही थी . वह बहुत दुखी और कमज़ोर दिखाई दे रही थी . सेठ ने क्षमा मांगते हुए कहा "मैं तुम्हारा अच्छा ख्याल रख सकता था, जो मेरे पास था!".

हम सब के पास जीवन में चार पत्निया होती है .
  1. चौथी पत्नी हमारा शरीर है . हम अच्छा दिखने के लिए कितना समय और ध्यान खर्च करते है पर मरने पर ये शरीर यही रह जाता है .
  2. तीसरी पत्नी ? हमारा अधिकार , पैसा और सम्पत्ति है जो हमारे मरने के बाद किसी और के पास चला जाता है .
  3. दूसरी पत्नी हमारा परिवार और मित्र है. इससे फर्क नही पड़ता कि वो हमारे कितने घनिष्ठ है जब तक हम जीवित है , वे हमारा केवल कब्र तक ही साथ देगे .
  4. पहली पत्नी हमारी आत्मा है जिसकी हम अक्सर आनन्द , उन्माद में उपेक्षा करते है .

एक छोटी सी कहानी

एक चील पेड़ पर बैठा आराम कर रहा था .
एक खरगोश ने उसे देखा और पूछा कि "क्या मैं भी तुम्हारी तरह बिना कुछ किए आराम से बैठ सकता हूँ ".
चील बोला "हाँ , क्यों नही ".
तो खरगोश जहाँ चील बैठा था उसी जगह नीचे जमीन पर बैठ गया और आराम करने लगा । तभी उधर से एक लोमडी गुजरी और उसने खरगोश को आराम करते देखा तो उसके ऊपर कूदी और खा गई .
  • आप अगर बैठे हुए हैं और कुछ नही कर रहे हैं , तो आप को बहुत ज्यादा ऊचाई पर होना चाहिए ।(हम जमीन पर रह कर अगर आसमान के सपने देखते है तो हमें वहां पहुचने के लिए कर्म करना पड़ेगा , बिना कर्म किये हम जमीन पर भी बहुत समय तक नही रह सकते हैं )