25 मार्च, 2009

जाना कहाँ है


एक नवयुवक एक छोटे से रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर के पास जाता है और पूछता है

युवक - पूर्व से आने वाली गाड़ी कब आएगी ?

स्टेशन मास्टर - घंटे बाद आएगी

युवक - पश्छिम से आने वाली गाड़ी कब आएगी ?

स्टेशन मास्टर - शाम को आएगी।

युवक - कोई मेल-एक्सप्रेस गाड़ी कब आएगी ?

स्टेशन मास्टर - ये छोटा स्टेशन है , यहाँ मेल गाड़ी नहीं रुकती है।

युवक - अच्छा ये बता सकते हैं कि मेल गाड़ी कब गुज़रती है ?

स्टेशन मास्टर - हर एक-आध घंटे में मेल-एक्सप्रेस गाड़ी यहाँ से पास होती है।

युवक - अच्छा कितनी देर बाद गाड़ी यहाँ से पास होगी ?

स्टेशन मास्टर - थोडी देर में एक गाड़ी पूर्व से आनेवाली है।

युवक - अच्छा पश्चिम से भी कोई गाड़ी आनेवाली है क्या ?

स्टेशन मास्टर - हाँ एक मालगाडी गुजरेगी।(स्टेशन मास्टर को अब गुस्सा आने लगता है )

युवक - अच्छा मतलब अभी १० मिनट के अन्दर कोई गाड़ी नहीं आएगी ?

स्टेशन मास्टर - नहीं, तुम्हे जाना कहाँ है ?(गुस्साते हुए )

युवक - जी मुझे पटरी पार करनी है।
(स्टेशन मास्टर अपना सर पटकने लगता है )

24 मार्च, 2009

हे हर हार आहार सुत


हे हर हार आहार सुत विनय करू कर जोर !
एक छोटी सी विनती सुनो तुम मोर !!

कितने सारे लोग लिख रहे नित्य नूतन लेख !
राम का नाम लेके लिखो आप भी आलेख !!

मिल गयी लेख पर टिप्पणिया तो समझे लंका जराये !
नहीं मिली अगर तो समझो बिन बूटीवाला पर्वत लाये !!

बहुत हुआ रथ के ऊपर बैठ देखत नजारा !
दिखाओ सारथी को अपना अतुलित बल सारा !!

उड़न खटोले बहुत उड़ गए आकाश में !
तुम भी अपना पवन वेग दिखाओ इस संसार में !!

कोई बैठा दूर देश में करता है राज !
दिखा दो आप भी अपना कौशल दुनिया को आज !!

नर-वानर, कुत्ते-बिल्ल्लियाँ और शिशु लिखते नित्य नए लेख !
आप भी एक रामनामा लिख कर करो श्री गणेश !!

प्रभु फुरसत से अब बैठो नहीं शुरू करो आलेख !
मंदी के दौर में भी दिन-प्रतिदिन वृद्धि कर रहे लेख !!

बहुत लिख दिया लोगों ने लेख नए ज्ञान के !
आप भी एक प्रहार करो बने क्यों हो अज्ञान से !!

पूजा-अर्चना बहुत हो गयी श्री राम की !
एक रचना लिखो फिर सुध रहेगी आराम की !!

आप भी अपना एक चिट्ठा ले आओ इस जगत में !
फिर उस पर अनुसरन करवाओ अपने भगत से !!

अपने लेखो को ब्लोगवाणी में सबसे पसंद करवाओ !
और चिट्ठा जगत में धुरन्धर लिक्खाड़ कहलवाओ !!

यह छोटी सी विनती सुनो तुम मोर !
हे हर हार आहार सुत विनय करू कर जोर !!

23 मार्च, 2009

दर्द क्या है

एक बार बहुत से लोगों ने एक सभा का आयोजन किया, विषय था दर्द क्या है। हर कोई अपनी राय देने के लिए स्वतंत्र था।

पहले एक डाक्टर महोदय आये और बोले "दर्द मांसपेशियों में खिचाव के कारण उत्पन होता है "।

कवि महोदय आये और बोले "दर्द एक अहसास है जो कविता को जन्म देता है "।

एक प्रेमी बोला "दर्द प्रेमिका की जुदाई से होता है "।

एक ब्लोगर बोले "लेख बड़ी मेहनत से लिखो और उसपे टिप्पणी न मिले तो दर्द होता है "।

एक विचारक बोले "दर्द वो है जो आनंद के न होने पर हम महसूस करते है "।

एक अभिनेता बोले "दर्द वो है जो पहले ही हप्ते फिल्म के फ्लाप होने पर होता है "।

एक छात्र बोला "दर्द परीक्षा में फेल होने पर होता है"।

शराबी बोला "दर्द वो है जो भरी बोतल के टूटने पर होता है "।

एक प्रोग्रामर बोला "दर्द वो है जब एक खुबसूरत लड़की मेरे प्रोजेक्ट को ज्वाइन करना चाहती है और प्रोजेक्ट मेनेजर मना कर देता है"।

एक महिला बोली "दर्द तब होता है जब मुझसे कम पैसे दे कर मेरी पडोसन वही साडी खरीद लाती है"।

अब हर कोई अलग-अलग तरह से दर्द की व्याख्या कर रहे थे, जब कई घंटे गुजर गए तो हमारे ताऊ से नहीं रहा गया। उन्होंने अपना लट्ठ उठाया और बजाना शुरू कर दिया, जब सब चिल्लाने लगे, तो ताऊ बोले अब दर्द समझ में आया या फिर से बताऊँ। सब बोले नहीं हमे समझ में आ गया। ताऊ बोले "जब तक दर्द होगा नही तब तक पता कैसे चलेगा, लट्ठ पड़ी तो सबको पता चल गया की दर्द कैसा होता है "।

21 मार्च, 2009

सुरेन्द्र जी का सबक

सुरेन्द्र जी ने रायबरेली से आने के बाद अपना कमरा बदल लिया, जहाँ पर एक सामूहिक स्नानागार और शौचालय था । कमरे में सब कुछ तो ठीक था पर सामान रखने के लिए कोई अलमारी नहीं थी, सुरेन्द्र जी अपना तेल, साबुन इत्यादि सामान खिड़की के ऊपर रखते थे । एक दिन सुबह उन्होंने अपना साबुन उठाया तो वो गिला था उन्हें लगा शायद कही से पानी गिर गया होगा, पर अगले दिन जब साबुन फिर गिला था, तो उन्हें शक हुआ की हो न हो कोई मेरा साबुन इस्तेमाल कर रहा है ।

उन्होंने ने सबसे पूछा "का हो केहू हमार साबुन लगावत हो का"। सबने मना कर दिया। अगले दिन वो सुबह ४ बजे उठ गए और देखने लगे की आज देखता कौन मेरा साबुन ले के जाता है , तभी उन्हें एक परछाई दिखाई देती है जो उनका साबुन ले के जा रही है, थोडी देर बाद उसने साबुन लाकर वहीँ रख दिया, लेकिन वो आदमी बगल वाले कमरे गया ये बात सुरेन्द्र जी को पता चल गयी।

सुबह उन्होंने बगल के कमरे में रहने वाले राम आसरे से पूछा "का हो तू हमार साबुन लगावत हो"। राम आसरे बोले "अरे सुरेन्दर भईया, हम त बिना साबुन के नहाईला , हम तोहार साबुन काहे लगाइब"।

सुरेन्द्र जी ने अब रंगे हाथो चोर को पकड़ने की सोची। उन्होंने एक नया साबुन लाकर वहीँ पर रख दिया। अगले दिन फिर कोई साबुन लेके गया, पर बहुत देर बाद उसने साबुन लाके वहां पर रख दिया। सुरेन्द्र जी ने एक दो लोगों को इकठा किया और हर कमरे के लोगो से जाकर मिलने लगे , अंतिम कमरा राम आसरे का था पर वो दरवाजा ही नहीं खोल रहा था । जब उन्होंने ने धमकी दी दरवाजा नहीं खोलोगे तो तोड़ देंगे तो , राम आसरे ने दरवाजा खोल दिया ।

राम आसरे को देखते सबकी हंसी छुट गयी , रामआसरे के सर, हाथ, भौह और पलकों के बाल गायब थे . हुआ ये था कि सुरेन्द्र जी ने बालसफा साबुन लाकर रख दिया था। सुरेन्द्र जी ने फिर कहा "जब हम कल तोहसे पूछे की हमार साबुन लगावत हो, त तू मना कई दिहो, इही खातिन हम इ बालसफा साबुन ले के आ ये रहे की, अब जे साबुन लगावत होए रँगे हाथे पकडा जाये। कल तू सच बोल दिहे होता त, का हम तोहके गोली थोड़े मार देते , पर तू झूठ बोले उही का इ सजा बा की अब तब महिना भर केहू के आपन चेहरा न दिखैबो और जिनगी भर चोरी कइके कौनो काम नहीं करबो ।"

उसके बाद से सुरेन्द्र जी का कोई समान बिना पूछे किसी ने कभी नहीं लिया , इतना खतरनाक सबक जो उन्होंने दिया था ।

20 मार्च, 2009

धमा-चौकड़ी बंद करो

बात उस समय की है जब मैं गाजियाबाद में रहता था । हम चार दोस्तों ने एक तीन कमरे का मकान किराये पर लिया हुआ था । कहने को तो हम चार लोग थे पर ऐसा कोई समय नहीं होता था की जब हमारे दो-तीन (कभी इससे ज्यादा) बाहरी मित्र न आये हुए हो । जब लड़के होगे तो शोर , चिल्लाना, दौड़ना-भागना तो होगा ही।दिन भर तो हम बाहर ही रहते थे पर शाम होते ही सारे कमरे पर इकट्ठे हो जाते थे। पूरी रात हम उल्लू की तरह जागते हुए बिताते थे करीब सुबह चार बजे हम सोते थे (रात भर गाने, बाते और कभी-कभी पढ़ाई भी होती थी )।

अभी हमें एक सप्ताह ही हुआ था वहाँ रहते हुए की हमारे एक पडोसी आ गए एक दिन सुबह-सुबह बोले "आप लोग रात को शोर कम किया करिए, पड़ोस में परिवार भी रहता है "। उनकी बात को ध्यान में रख कर हम एक दिन तो शांत रहे पर , अगले दिन से फिर वही पुराने ढर्रे पर आ गए।

तीन दिन बाद हमारे पडोसी फिर आये, बोले "आप लोगो से कहा की रात को शोर मत किया किजीये, पर आप लोग मान नहीं रहे, सुधर जाइये वरना मकान खाली करवा देंगे"। इस बार उनकी बात सुन कर हमने अपने दोस्तों से बोल दिया की वो रात में न आया करे । तीन दिन तक सब ठीक रहा पर फिर हम वापस पुराने रूप में आ गए ।

इस बार हमारे पडोसी दो आदमियों को लेके आये । वो लोग सोसायटी के मेंबर थे, उन्होंने ने कहा की "आप लोग अपनी धमा चौकड़ी बंद नहीं करेगे , तो आप के मकान मालिक से बोल कर ये मकान खाली करवा देंगे"। इस बार हमने कसम खाई की अब कोई धमा चौकड़ी नहीं होगी रात को जल्दी सो जायेगे।

मन तो चंचल होता है कहाँ मानने वाला और रात को जागने की बुरी आदत भी हमें लग गयी थी, सुबह ४ बजे से पहले सोते ही नहीं थे, दो दिन बाद हम वापस पुराने तरीके से जीने लगे और सोच लिया की "इस बार अगर निकालने की धमकी देंगे तो कह देंगे निकलवा दिजीये, पर हम नही बदलेगे"।

१० दिन बाद हमारे पडोसी फिर आये । इस बार वो बड़े प्रेम से पूछ रहे थे कि " कैसे हो, कोई दिक्कत हो तो बताना"। हम सोच में पड़ गए हर बार आके शिकायत और गुस्सा करने वाले इतने प्रेम से कैसे बोल रहे है , ये ह्रदय परिवर्तन कैसे हो गया , उलटी गंगा कहाँ से बह निकली। हिम्मत करके हमने पूछ लिया "क्या बात है अंकल जी , आज आप बड़े प्यार से बात कर रहे हो "। तो वो बोले "मैं और मेरा परिवार एक सप्ताह के लिए बाहर गए थे, कल रात को ही आये, तो पता चला की पिछले हप्ते मोहल्ले में कई चोरिया हुई , जिस घर में कोई नहीं था , उनका तो सारा सामान ही ले के चले गए, पर हमारे घर से कुछ भी नहीं चुराया गया, इसका कारण आप लोग है, आप लोग रात भर जो शोर करते और जागते रहते हैं न उसी वजह से चोर हमरे घर नहीं आये।" फिर बोले "आप लोग जैसे चाहे रहिये, हाँ बस रात को तेज़ आवाज में गाने मत सुना करिए" ।

उस दिन हमें लगा की उल्लू की तरह रात में जागने से कम से कम किसी का तो भला हुआ । कुछ दिन बाद साथ के दो दोस्तों में किसी बात पर बहस हो गयी , बात हाथा-पाई पर आ गयी तो वो बोले की अब हम दोनों में से कोई एक ही यहाँ रहेगा, मैंने कहा जिसको हम बाहर निकालेगे उससे सम्बन्ध ख़राब हो जायेगे, तो ऐसा ही कि "आप दोनों लोग ही मकान छोड़ दीजिये"। कुछ दिन बाद मैंने भी मकान खाली कर दिया। लेकिन आज भी वो रात भर जागते रहना याद है ।

18 मार्च, 2009

इलाहाबाद से रायबरेली

मेरे गाँव में एक सुरेन्द्र जी है. वो अपने साथ घटी एक घटना अक्सर सुनाते हैं , वो मैं आज आप को सुनाने जा रहा हूँ .

करीब १५-२० साल पहले की बात है , सुरेन्द्र जी इलाहाबाद में रह कर सरकारी नौकरी की तैयारी करते थे . घर से ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे तो उन्होंने प्रयाग स्टेशन के पास एक कमरा किराये पर लिया हुआ था . कमरे के अलवा और कुछ नहीं था , ना रसोई और ना ही शौचालय.

दैनिक क्रिया-कर्म के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ता था । घर के सामने से रेलवे लाइन जाती थी । जैसा की हमें पता ही है की रेलवे पटरी के किनारे स्थाई शौचालय के तौर पर प्रयोग किये जाते हैं ।सुरेन्द्र जी भी पटरी पार करके निपट आते थे

एक दिन सुबह उठे तो देखा पटरी पर एक गाड़ी खड़ी है , बहुत देर इंतजार करने पर जब वो गाड़ी नहीं गयी तो उन्होंने सोचा क्योंना डिब्बे के अन्दर से होते हुए उस पार चले जाये । लोटा ले के ये गाड़ी के अन्दर चढ़ गए तो उन्हें सामने डिब्बे में बना शौचालय दिख गया , मन में विचार किया की कहा बाहर जाये गाड़ी बहुत देर से खड़ी है इसी में निपट लेते हैं .

अभी वे शौचालय का प्रयोग कर ही रहे थे की गाड़ी चल दी . जब तक वो बाहर आकर उतरते तब तक गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली , गाड़ी कोई सुपर फास्ट थी जो इलाहाबाद से चलकर सीधे रायबरेली में रुकती थी (इलाहाबाद से रायबरेली १२० किमी दूर है ).

अब सुरेन्द्र जी परेशान लुंगी और बनियान पहने हाथ में लोटा लिए , डर रहे की कहीं टी टी आ गया तो क्या करेगे । करीब डेढ़-दो घंटे बाद वो रायबरेली पहुँच गए , अब कहाँ जाये इस हालत में .

उनके एक चचेरे भाई रायबरेली में रहते थे, उनका पता उन्हें याद था . पहुँच गए उनके घर, उनकी भाभी जी ने दरवाजा खोला और उन्हें इस हालत में देख कर उन्हें लगा की कुछ अनिष्ट हुआ है जिसकी सुचना देने ये हड़बडी में ऐसा लुंगी-बनियान में आ गए हैं और उन्होंने रोना शुरू कर दिया . रोने की आवाज सुन उनके भाई बाहर आये तो सुरेन्द्र जी ने पूरा हाल उन्हें सुनाया की किस तरह से वो इलाहाबाद से रायबरेली पहुँच गए .

उनके भाई ने उन्हें रोक लिया बोला "कल सुबह ट्रेन पकड़ के चले जाना आज यहीं रुक जाओ" .उधर शाम हो गई और सुरेन्द्र का कोई पता नहीं , घर का दरवाजा खुला हुआ (सुरेन्द्र जी ने सोचा था की अभी १० मिनट में आ जाऊंगा तो क्या ताला बंद करू )अगल-बगल वाले खोज करने लग गए जब वो कहीं नहीं मिले तो हुआ की कल सुबह चल के थाने में गुमशुदा की रिपोर्ट दर्ज़ करा देंगे .

अगले दिन सुबह जब सुरेन्द्र जी अपने कमरे पर पहुंचे तो उन्हें पता चला की अगर वो कुछ समय और देर से आते तो उनके गुम होने की रिपोर्ट थाने में लिखवा के उनके घर पर खबर कर दी जाती . जब उन्होंने अपने साथ हुई घटना सबको सुनाई तो सबका हँसते - हंसते बुरा हाल था , एक बोले अच्छा हुआ ट्रेन रायबरेली रुकती थी कही दिल्ली जा के रुकती तो वापस भी नहीं आ पाते.