17 मार्च, 2009

न्यूटन का ब्लॉग सिद्धांत

यदि सर आइज़क न्यूटन जी आज होते तो शायद उन्होंने ब्लॉग के लिए तीन नियम बताये होते

पहला नियम :

यदि कोई ब्लोगर ब्लॉग लिख रहा है तो वह लिखता ही रहेगा और टिपियाता रहेगा जब तक उसके लेख पर टिप्पणिया मिल रही है ।

दूसरा नियम :

लेख परिवर्तन की दर टिप्पणियों के समानुपाती होती है और उसकी (लेख परिवर्तन की) दिशा वही होती है जो टिप्पणियों की होती है।

तीसरा नियम :

प्रत्येक टिप्पणी के बराबर एवं विपरीत प्रतिटिप्पणी होती है।

और अंत में उन्होंने कहा होता

"ब्लॉग न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट हो सकता है , सिर्फ एक ब्लोगर से कुछ टिप्पणियों के नुकसान के साथ किसी अन्य ब्लोगर को हस्तांतरण हो सकता हैं."

16 मार्च, 2009

हनुमान जी और गणित

घर गया तो पता चला उ. प्र. बोर्ड की परीक्षा चल रही है. मेरे एक मित्र जो अध्यापक हैं रास्ते में मिल गए तो उनसे बात होने लगी तो उन्होंने एक किस्सा सुनाया।

एक लड़का था जो हाई स्कूल की परीक्षा में दो बार गणित विषय में फेल हो गया था । तीसरी बार जब वह गणित का पेपर देने जा रहा था तो सुबह - सुबह हनुमान जी के मंदिर में गया और हनुमान जी से बोला "हे बजरंग बली आज मेरा गणित का पेपर है, मैं दो बार से फेल हो रहा हूँ , इस बार भी पास होने की उम्मीद नहीं है, हे संकट मोचन मेरे को इस बार पास करवा दिजीये मैं आपको सवा किलो बेसन का लड्डू चढाऊंगा"।

परीक्षा कक्ष में पहुँच कर उसने हनुमान जी को याद किया और पेंसिल से सारे प्रश्न कापी में लिख दिए और नीचे लिखा "हे बजरंग बली मैने सारे सवाल पेंसिल से लिख दिए है , आप इसे मिटा के हल लिख दीजियेगा"।

जब परीक्षा का परिणाम आया तो इस बार भी वह गणित में फेल हो गया तो वह सीधे हनुमान जी के मंदिर में जाता है और बोलता है "क्या बजरंग बली , जब आप को भी गणित नहीं आती थी तो पहले बोलना था न , मैं किसी और भगवान से बोलता. एक साल और ख़राब कर दिए आप मेरा"

14 मार्च, 2009

होली में पहेली

१०० लोग की पहेली का सही उत्तर

१३ दोस्त + १५ रिश्तेदार + ७२ घरवाले = १०० लोग

सही जवाब दिया सतीश चंद्र सत्यार्थी जी ने , बहुत बहुत बधाईया

होली में गाँव गया तो मेरी 6 वर्ष की भतीजी मेरे पास आई और बोली "चाचा मेरे पहेली का जवाब दे सकते हो"। मैंने कहा पहेली पूछोतो उसने मुझसे तीन पहेली पूछी

- एक हाथी के सामने १२ केले रखे थे, उसने ११ खा लिए पर १२ वां नहीं खाया बताओ क्यों ?
मैंने कहा "केला ख़राब रहा होगा"। वो बोली गलत "१२ वां केला प्लास्टिक का था"

- एक हाथी के सामने १२ केले रखे थे, उसने एक भी नहीं खाया बताओ क्यों ?
मैंने कहा "सारे केले प्लास्टिक के होंगे"। वो बोली गलत "हाथी प्लास्टिक का था "

- एक बार हाथी और चींटी छुपम-छुपाई खेल रहे थे , चींटी जा के मंदिर में छुप जाती है लेकिन हाथी को पता चल जाता है की चींटी मंदिर में है, बताओ कैसे ?
मैंने कहा "हाथी ने चींटी को छुपते हुए देख लिया होगा "। वो बोली गलत "चींटी की चप्पल मंदिर के बाहर थी"।

फिर बोली लगता है आप पढ़े लिखे नहीं है जो मेरे एक भी पहेली का जवाब नहीं दे पाएअगली बार पढ़ के आईयेगा

05 मार्च, 2009

१०० लोग

बहुत - बहुत धन्यवाद आप का जो आपने ब्लॉग सार को पसन्द किया और अपना अमूल्य समय और सुझाव दियाकल सुबह मैं इस्पात शहर (जमशेदपुर) से आपने घर जौनपुर चला जाऊंगाघर पर कुछ आवश्यक कार्य और होली के कारण जाना पड़ रहा है वर्ष से मैं होली पर घर नहीं गया पर इस वर्ष ये मौका मिल गया . घर जाने पर शायद ब्लॉग लिखने और पढने का समय मिले

होली की हार्दिक शुभ कामनाये

मैंने अभी तक अपने लेख में किस्से-कहानी, कविता, हास्य रचना सबको शामिल किया पर कोई पहेली या सवाल नहीं किया तो मैं सोच रहा हूँ की आप लोगो से एक सवाल पूछ ही लिया जायेये सवाल बहुत पहले मुझसे किसी ने पूछा था और उसने मुझे सप्ताह का समय दिया था, तो मैं भी आप को सप्ताह का समय दे रहा हूँसवाल ये है कि

एक बारात में १०० लोग जाते है और उन्हें खाने के लिए १०० थालियाँ मिलती हैंसमस्या ये है कि बारात में लड़के के दोस्त कहते है कि वो थाली में खायेगेरिश्तेदार बोलते है कि वो थाली में खायेगे, तब लड़के के घरवाले बोलते हैं कि हमारे आदमीं एक थाली में खा लेगेऔर आश्चर्य कि बात वो १०० लोग १०० थालियों में शर्त के अनुसार खा लेते हैअब आप को बताना है कि लड़के के दोस्तों , रिश्तेदारों और घरवालो कि अलग-अलग संख्या क्या थी लेकिन ध्यान रहे किसी कि संख्या १० से कम नहीं थी

आप के उत्तर की प्रतिक्षा में ....

04 मार्च, 2009

ब्लॉग सार

* क्यों व्यर्थ लेख की चिंता करते हो ? टिप्पणी न मिलने से डरते हो ? कौन तुम्हारी टिप्पणियाँ छीन सकता सकता है ? टिप्पणी पाने के लिए टिप्पणियाँ करते हो, टिप्पणियाँ न पैदा होती है न मरती है !

* जो लिखा अच्छा लिखा, जो लिखोगे वो अच्छा ही लिखोगे , जो टिप्पणियाँ मिलेगी, वो भी अच्छी होगी ! तुम पुराने लेख का पशचाताप न करो , भविष्य के लेख की चिंता न करो, वर्तमान पढ़ा जा रहा है !

* तुम्हारा क्या गया ,जो तुम दुखी होते हो ! तुम क्या नया लाए थे ,जो लोगो ने नहीं पढ़ा , तुमने क्या लिखा था , जो टिप्पणियों का अभाव हो गया ?

* तुम केवल ब्लॉग खाता लेकर आये ! जो लिया, इसी (ब्लॉग ) से लिया ! जो दिया इसी को दिया !

* बिना लेख के आए , और बिना टिप्पणियों के चले गए !

* जो लेख आज तुम्हारा है, कल किसी और का था ! परसों किसी और का होगा ! तुम इसे अपना समझ कर टिप्पणियाँ ले रहे हो ! बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:ख का कारण है।

* परिवर्तन ही ब्लॉग का नियम है ! एक लेख में तुम सैकडो टिप्पणियों के स्वामी बन जाते हो , दुसरे लेख में तुम टिप्पणी विहीन हो जाते हो ! मेरा लेख ,उसका लेख ,मन से मिटा दो ,फिर ब्लॉग जगत तुम्हारा है , तुम ब्लॉग जगत के हो !

हे पार्थ
जब-जब अच्छे चिट्ठाकार आयेगे तब-तब मैं उनके लेख पढ़ कर उनपर टिप्पणियाँ करूँगा ।
समय आने पर मैंने उन चिट्ठाकारों का प्रोत्साहन और अनुसरण भी करूँगा .

विस्तृत गीता ज्ञान स्वामी समीरानन्द जी द्वारा तीन वर्ष पहले लिखा गया है उसे पढने के लिए यहाँ चटका लगाये .

03 मार्च, 2009

वो होली की सुबह

होली आने वाली है और मुझे उस आदमी का चेहरा फिर याद आने लगा है । वर्ष २००६ की बात है । मैं उस समय गाजियाबाद में रहता था । दो दिन बाद होली थी, मैं अपने घर जौनपुर जाने की तैयारी कर रहा था पर अचानक मेरे सर में तेज दर्द होने लगा और हल्का - हल्का बुखार भी होने लगा तो मैंने घर पर फ़ोन करके माता जी से बोला दिया की "तबियत ठीक नहीं है इसलिए कल सुबह यहाँ से चलूँगा "। जब बुखार बहुत तेज हो गया तो मैंने अपनी बुआ जी (जो गाजियाबाद में ही रहती थी ) को फ़ोन कर के बताया की मेरी तबियत ठीक नहीं है और अपने एक मित्र को मैंने अपने पास बुला लिया ।

मेरे मित्र ने आने के बाद मुझसे कहा की अगर तबियत ठीक नहीं है तो चलो डॉक्टर को दिखा लो । मैंने कहा "मेरे पास हिम्मत नहीं है की डॉक्टर के पास जाऊँ , तुम जाके दवा ले आओ "। रात को बुआ जी आयीं और उन्होंने बुखार उतारने के लिए ठंडे पानी की पट्टिया मेरे सर पर रखीं और बोला की अगर ज्यादा दिक्कत हो तो फ़ोन करना हम आ जायेगे ।

सुबह बुआ जी फिर आयीं मुझे देखने के लिए पर मुझे कुछ पता नहीं था , क्योंकि मैं बेहोश हो चुका था । इस बात का पता मेरे मित्र को भी नहीं था, उसे लगा की मैं सो रहा हूँ । बुआ जी ने पास के ही एक निजी चिकित्सालय में मुझे भर्ती करवा दिया पर कई घंटे बीत जाने पर जब मुझे होश नहीं आया और मेरे रक्त का दबाव कम होता जा रहा था , तो चिकित्सालय के मालिक ने एक वरिष्ठ चिकित्सक को बुला कर मुझे दिखाया । चिकित्सक ने देखा की मेरे शरीर पर कुछ दाग के निशान आ गए हैं तो उन्होंने बताया की ये मेनिन्गोक्समिया नामक बीमारी हो सकती है , यह बीमारी इस समय दिल्ली और आस पास के इलाको में फैली हुई है ।चिकित्सक के परामर्श पर मुझे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया ।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मेरा इलाज शुरू हो गया, रात होते - होते मुझे होश आ गया । होश आने पर मैंने अपने आप को अस्पताल के एक कमरे में पाया ,कमरे में केवल तीन लोग थे । मैं बीच में था, मेरे दायीं तरफ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था जो बेहोश था और बायीं और एक १०-१२ साल की बच्ची थी । कमरे में जो भी नर्स या डाक्टर आते मुहं पर हरे रंग की पट्टी बांध कर आते , मैंने नर्स से पूछा की मुझे क्या हुआ है और मेरे घर वाले कहा हैं ? नर्स ने बताया की मुझे मेनिन्गोक्समिया बीमारी है और यह बीमारी छूने , बोलने और किसी भी तरह सम्पर्क में आने पर दुसरे व्यक्ति को हो सकती है इसलिए आप के पास किसी को आने की अनुमति नहीं है । हाँ अगर कोई मिलना चाहे तो एंटीबैटिक दवा खा के आप से थोडी देर के लिए मिल सकता है। मैंने फिर पूछा की "मुझे यहाँ कब तक रहना होगा?" तो उन्होंने बताया की आप की टेस्ट रिपोर्ट कल शाम को आएगी उसके बाद ही कुछ पता चलेगा। उसने बताया की इस बीमारी में अगर २४ घंटे के अन्दर सही इलाज शुरू न हुआ तो शरीर के सारे अंग ख़राब होने लगते है और तीन दिन के अन्दर इन्सान की मौत हो जाती है ।

सुबह होने पर देखा माता जी और पिता जी घर से आ गए थे , बुआ जी ने बताया की "वो और मेरे कुछ मित्र कल से यही पर हैं लेकिन तुम्हारे पास किसी का ज्यादा देर तक रहना मना है इसलिए वो बाहर थे" । तभी मेरे बगल के लोगों से मिलाने उनके घर वाले आ गए थे । वह आदमी जो मेरे दायी ओर था उसे अब थोडा होश आ गया था और वह घर जाने की बात कर रहा था , वह कह रहा था की "अगले महीने उसकी बेटी की शादी है उसे बहुत काम है"। उसकी पत्नी उन्हें समझा रही थी पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था । वह आदमी बात करते - करते चिल्लाने लगता था और फिर बेहोश हो जाता था ।

उसकी पत्नी ने बताया की वो मेरठ के रहने वाले है , उसकी दो लड़कियां है अगले महीने बड़ी की शादी है , तीन दिन पहले उसके पति को बुखार आया था तो वही के डॉक्टर से इलाज करवा रहे थे पर कल शाम को जब डाक्टर ने जवाब दे दिया तो यहाँ ले के आये हैं ।

शाम को मेरी रिपोर्ट आ गयी थी , डाक्टर ने बताया की कल सुबह मुझे सामान्य वार्ड में भेज दिया जायेगा क्योंकि मेरा इलाज सही समय पर शुरू हो गया इसलिए रक्त और त्वचा को छोड़ कर शरीर के किसी अंग को नुकसान नहीं हुआ है।

रात के करीब १० बज रहे थे , अचानक मेरे बगल लेटा आदमी उठ जाता है और मुझे बहुत काम करना है कह कर बाहर भागने लगता है , अस्पताल के कर्मचारी उसे पकड़ के वापस लाते हैं । उस आदमी को वो लोग चारपाई से बांध देते है जिससे वो दुबारा न भाग पाए । डाक्टर आके उसे देखते है और नर्स से कुछ सुई लगाने को कहते है । नर्स के सुई लगाने पर वह आदमीं फिर शांत हो जाता है ।

रात के करीब २ बज रहे होगे तभी एक तेज चिल्लाने की आवाज आती है , मैं उठ के देखता हूँ तो उस आदमी ने रस्सी तोड़ दी है और उठ के बैठ गया है , मैं सोचता हूँ की आखिर इसने ये रस्सी कैसे तोड़ दी , मैं उससे बात करने की कोशिश करता हूँ पर तभी वो वापस लेट जाता है । डाक्टर और नर्स आते हैं और उसको देखने के बाद डाक्टर बोलते है की "इसके घर वालो को बुला दो ये मर चुका है" । उसकी पत्नी आती है और अपने पति की लाश देख कर रोना शुरू कर देती है , तभी अस्पताल के कर्मचारी आते है और बोलते हैं की अभी ३ बज रहे हैं आप इनको लेके अभी निकल जाओ वरना सुबह होने पर होली होने के कारण कोई गाड़ी मेरठ नहीं जा पायेगी । मेरे आँखों के सामने उस आदमी को सफ़ेद कपडे में सिल के एक बड़े प्लास्टिक बैग में डालके बाहर लेके चले जाते हैं ।

मुझे अपनी शंका का समाधान मिल जाता है की वो रस्सी उसने नहीं तोड़ी बल्कि वो उसकी प्राण वायु थी जो उसे छोड़ के जा रही थी । होली आने वाली है और मुझे उस आदमी का चेहरा फिर याद आने लगा है।