14 अप्रैल, 2009

लखनऊ में शादी

शायद १०-१२ साल पहले की बात है . मैं गाँव गया हुआ था। दादा जी ने बताया की पड़ोस गाँव में उनके एक मित्र है उनके लड़के की लखनऊ में शादी है, शादी में मुझे जाना है (दादा जी घर के अलावा कहीं भी भोजन ग्रहण नहीं करते थे इसलिए वो किसी भी शादी में नहीं जाते थे )। मैं बड़ा खुश हुआ लखनऊ बारात जा रही है तो अच्छी व्यवस्था होगी, खाने को अच्छा व्यंजन मिलेगा ।

मैं और मेरे चचेरे चाचा जी बारात में गए। बारात को ठहराने की व्यवस्था एक ३ सितारा होटल में की गई थी । खास लोगों के लिए कमरे थे और आम लोगों के लिए एक हाल में सोने की व्यवस्था की गयी थी। नाश्ते और खाने की वयवस्था बहुत अच्छी थी, पर गाँव के लोग पहली बार बफे सिस्टम में खा रहे थे, तो उन्हें बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। बफे सिस्टम को कोई गिद्ध भोज, तो कोई कुक्कुर भोज कह रहा था, एक लोगों बोल रहे थे "हम गाय-भैंस है क्या, जो खड़े हो के खाए , इतना पैसा खर्च किया २-४ मेज-कुर्सी ही लगवा देते"। कई लोगों को तो पता ही नहीं चला की वो क्या खा रहे है और बहुत से लोग तो बिना खाए ही रह गए।

रात को देर से सोये, सुबह देर से उठे तो हुआ की दैनिक क्रिया से निवृत हो लिया जाये। टॉयलेट का दरवाजा खोला तो दंग रह गया, अन्दर पाश्चयात शौचालय था, जिसका शायद किसी ने प्रयोग नहीं किया था, बहुत लोग तो फर्श पर ही हलके हो लिए थे, बड़ी हिम्मत करके सोचा पानी डाल के गंदगी बहा देता हूँ, पर बाल्टी और मग को भी लोगों ने भर दिया था। वो तो शुक्र था खाना रात को खाया था, अगर सुबह कुछ खाया होता तो पक्का उलटी कर देता

मैंने लड़के के पिता जी से कहा "बाबा, पेट खली करना है, कहाँ जाऊ , "। बाबा बोले " बच्चा, अभी हालत ठीक है तो रोके रहो, नहीं तो बाहर कही हो आओ, यहाँ के सारे टॉयलेट भाई लोगों गन्दा कर दिया है, दरवाजा खोलना मुश्किल है, मनेजर सुबह-सुबह कई लोगों को सुना के गया है"।

मैं और चाचा जी बाहर जा के सार्वजनिक शौचालय से निपट आये। वापस आये तो लोग काफी, पकौडे और जलेबी का नास्ता कर रहे थे। तभी लड़की के भाई को लड़के के बड़े पिता जी (ताऊ ) ने पकड़ लिया और उससे कहने लगे "हलवाई बहुत ख़राब है, देखो चाय का दूध ही जला दिया है, कैसा कड़वा स्वाद आ रहा है"। लड़की का भाई बोला "जी ये चाय नहीं काफी है "।

लड़के के बड़े पिता जी फिर बोले "रात को खाने में भी सुरन (जिमीकंद) की सब्जी भी चीमड़ (सख्त )कर दिया था और एक बात बताओ ये दुई ठो गोभी की सब्जी काहे बनवाए थे "। लड़की का भाई सोच में पड़ गया , सुरन की सब्जी तो बनी नहीं थी, इन्हें खाने के लिए कहाँ से मिल गयी और गोभी तो एक बनी थी दूसरी सब्जी गोभी की कहाँ से आ गयी

चाचा जी बोले "काका , पनीर की सब्जी को सुरन समझ रहे है और मसरूम वाली सब्जी को भी गोभी समझ रहे हैं "। लड़की का भाई अभी कुछ बोलता उससे पहले लड़के के बड़े पिता जी बोले उठे "ये पनीर तो नाम सुने है और जानते है पर इ मसरूम का है "।

चाचा बोले "काका , कुकुरमुत्ता जो खाने वाला होता है उसे मसरूम बोलते है "। लड़के के बड़े पिता जी "राम राम , तो हमें इ लोग कुकुरमुत्ता खिला दिए"। बड़ी मुश्किल से लड़की वालों ने उन्हें समझाया तब जा के कहीं वो शांत हुए ।

उस शादी से लौटने के बाद अब गाँव का कोई भी बुजुर्ग बड़े शहर की शादी में नहीं जाता है और न ही कोई लेके जाता है ।

25 टिप्‍पणियां:

  1. हमने भी कई शादियों में ये हाल देखा है बफर सिस्टम में हालत बुरी हो जाती है ....अब कहाँ कोई रेस्पोंसिबिलिटी लेना चाहता है ...खुद खाओ तो खाओ नहीं तो मरो हमारी बला सा ...हमने तो दावत दे दी :):)

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  2. आपने तो सच में डरा दिया....... क्या कहानी है।

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  3. "बफे सिस्टम को कोई गिद्ध भोज तो कोई कुक्कुर भोज कह रहा था " वास्तव में जो खाने का मजा बैठ कर आराम से खाने में है वो बफर सिस्टम में नहीं आता .
    लड़कीवालों को ऐसे बड़े होटल में वयवस्था ही नहीं करनी चाहिए थी जहा , ग्रामीण परिवेश वाले अर्जेस्ट न कर सके .

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  4. इतना भयानक मंजर लिख दिया है आपने तो :)

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  5. वाह क्या शादी थी , ऐसी शादी आपको हमेशा याद रहेगी .
    :)

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  6. बहुत खूब चित्रण किया है
    "टॉयलेट का दरवाजा खोला तो दंग रह गया , अन्दर पाश्चयात शौचालय था जिसका शायद किसी ने प्रयोग नहीं किया था , बहुत लोग तो फर्श पर ही हलके हो लिए थे, बड़ी हिम्मत करके सोचा पानी डाल के गंदगी बहा देता हूँ , पर बाल्टी और मग को भी लोगों ने भर दिया था . वो तो शुक्र था खाना रात को खाया था अगर सुबह कुछ खाया होता तो पक्का उलटी कर देता"
    बाप रे का मंजर रहा होगा .

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  7. जबरदस्त गाँव है ....हमें तो बीस साल पहले का यद् है ,एक बार गाँव से कोई बाबा जी हमारे यहाँ आये एक दिन रुक कर गए .गाँव में जाकर बोले .अरे सतपाल (पिता जी )के लौंडे बड़े बत्तमीज़ है...ब्रेड को दोनों ओर से सेक कर खाते है..अज तक हमें बदतमीजी ओर दोनों ओर से सिकी हुई ब्रेड का सम्बन्ध समझ नहीं आया . ..

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  8. मजेदार वाकया है। इस तरह के गंवई मनई लोगों में शामिल हो मजे लेने का एलग ही लुत्फ है जो कि शहरी बनावट से बेहतर है। इसे ही मनसायन कहते हैं।

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  9. आलोक भईया ऐसा जबरदस्त किस्सा गांव वालों के साथ ही होता है । का का खा ले इतना कुछ होता है । आज भी लोग को मशरूम के बारे में नाही पता है ।वाकिया मजेदार लगा ।

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  10. जबर्दस्त किस्सा सुनाया आपने.

    रामराम.

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  11. भाई ये सच में कहानी ही है ना कहीं यह सच्‍चाई : : :

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  12. अरे कैसा किस्सा सुना दिए भाई ,पर है मजेदार .

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  13. जहां जहां प्रेम घटा है वहां वहां बुफे का प्रचलन बढ़ा है। हमारे शहर में भी अधिकांश भोज बुफे हो गए हैं लेकिन कुछ लोग अब भी पुराने तरीके से प्रेम से खाना खिलाते हैं। :)

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  14. गाँव के लोगों पर शहर का चाल-चलन थोपेंगे तो नतीजा यही निकलेगा! गूढ़ बात यह है कि हम देसी लोगों पर जिस तरह अंग्रेजी कानून और सिस्टम थोपे गये हैं, उसका भी कुल मिलाकर यही हाल है!

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  15. शहरीकरण का जो लेखा जोखा आपने बहुत सुंदर तरीके से लिखा .......कविले तारीफ है.

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  16. BAHUT ACHCHHA LEKH
    U R WELCOME AT BHADAS FOR U.P. AT UP4BHADAS.BLOGSPOT.COM

    REGARDS
    SALEEM KHAN
    SWACHCHH SANDESH: HINDOSTAAN KI AAWAAZ

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  17. शादियों में अक्सर ऐसा माहोल दिखाई देता है............आपका कुकुरमुत्ते वाला प्रसंग भी मजेदार है

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  18. अरे बाप रे ! क्या नजारा रहा होगा !

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  19. वाह वाह क्या बात है! बहुत ही उन्दा लिखा है आपने !

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