25 फ़रवरी, 2009

एक अनुरोध अंतरजाल के इस जगत से

आज कुछ दिनों से इस ब्लॉग जगत में चारो ओर ब्लॉग की रूप-रेखा , सामग्री , अभिव्यक्ति , आलोचना , कल्पना और आकार -प्रकार और जाने क्या - क्या बाते हो रही है . कुछ बाते तो ऐसी हैं जो मेरे समझ से परे हैं पर कुछ बाते ऐसी है जो समझ में आते हुए भी समझ में नहीं आ रही है ,कोई लिख रहा है की उसे अब पता चल की वो एक ब्लोगर है तो कोई अपने आप को भुनगा बता रहा है , तो किसी के फालोवर लापता हो गए हैं , ये चारो ओर क्या हो रहा है मुझे समझ में नहीं आ रहा है .

इसका कारण ये है की मैं वो हूँ जो अक्ल बड़ी या भैंस में ,भैंस को बड़ा कहता हूँ . अक्ल दिखती नहीं और भैंस को आप बिना चश्मे के भी देख लोगे . अक्ल रहती कहा है दिमाग में और दिमाग रहता है सर में और सर कितना भी बड़ा हो भैंस से तो बहुत छोटा होता है . अब मैं ठहरा भैंस को बड़ा मानने वाला और लोग यहाँ बात कर रहे हैं दिमाग की तो अगर इतनी ऊची और बड़ी बाते होगी तो मेरे समझ से बाहर की बात होगी .

मैं ठहरा लप्पु-छन्ना(निम्न कोटि का ब्लोगर ) और चारो ओर चर्चा करने वाले महान और उच्च कोटि के धुरंधर लेखक और जो नहीं थे वो दूसरो की संगत में आ के बन गए . अब मैं इस जगत में नया और भैंस पुजारी ब्लोगर इन लोगो की बात कैसे समझ सकता हूँ .

ले दे के एक काम आता था दुसरे के लेखो पर टिप्णी पर अब उसके लिए भी दिमाग लगाना पड़ेगा सुना है अब आप कि टिप्णी पर कोई भी आप को अदालत में घसीट सकता है . लिखना तो आता नहीं था और पढ़ना भी आसान नहीं . मेरे साथ तो वो कहावत हो रही है " जहाँ जाये भूखा वहां पड़े सुखा ". पुराने लोग मठाधीश के पद पर आसीन है और उनके साथ बहुमत ज्यादा है और हम ठहरे निर्दलीय तो लगता है हमारी जमानत जप्त हो के ही रहेगी .

मेरा अनुरोध है पुराने और ज्ञानी लेखक और विचारको से कि इस भागम-भाग और परिवर्तन के दौर में मुझ जैसा ब्लोगर कही गुम न हो जाये. इसलिए कृपया इस जगत को किसी सीमा परिधि में न बाधें, और सब को अपनी इक्क्षा से अपने आप को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करे .

4 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो टिप्पणी देने आते रहेंगे.

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  2. अजी चिन्ता मत कीजिए, आज के लप्पु-छन्ना ही कल के मठाधीश होंगे.

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  3. काहें दिल दुखावे केर बतकही करत हौ

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